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सोनम वांगचुक का आंदोलन: शिक्षा प्रणाली पर गंभीर सवाल

सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षा प्रणाली की जवाबदेही से परे जाकर एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है: क्या भारत अपने युवाओं का भविष्य संवार रहा है या केवल उनके क्रम को निर्धारित कर रहा है? उनका अनशन और संघर्ष उन लाखों युवाओं की आवाज है, जिनका विश्वास परीक्षा प्रणाली में लीक और अव्यवस्थाओं ने तोड़ दिया। क्या लोकतंत्र नागरिकों की आवाज सुनने में सक्षम है? यह लेख वांगचुक के विचारों और उनके आंदोलन के पीछे के गहरे अर्थों पर प्रकाश डालता है।
 

सोनम वांगचुक का आंदोलन और शिक्षा प्रणाली


सोनम वांगचुक का आंदोलन शिक्षा प्रणाली की जवाबदेही से कहीं अधिक है। वे उस मानसिकता पर सवाल उठा रहे हैं, जिसने शिक्षा को केवल छँटाई का माध्यम बना दिया है। उनके आंदोलन का मूल प्रश्न यह है कि क्या भारत अपने युवाओं का भविष्य संवार रहा है या केवल उनके क्रम को निर्धारित कर रहा है।


लोकतंत्र की विफलता


लोकतंत्र की असली विफलता तब होती है जब नागरिक को अपनी बात रखने के लिए अपने शरीर को अंतिम तर्क बनाना पड़ता है। किसी भी गणतंत्र में यह अस्वीकार्य है कि नागरिक की बात तब सुनी जाए जब वह गंभीर स्थिति में पहुँच जाए। राज्य को ऐसे दरवाजे खोलने चाहिए जहाँ नागरिक की महत्वपूर्ण शिकायतें सुनी जाएं, न कि तब जब वह संकट में हो।


18 जुलाई 2026 को सोनम वांगचुक को दिल्ली के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। उन्होंने 28 जून को आमरण अनशन शुरू किया था, जिसका उद्देश्य उन लाखों युवाओं की आवाज उठाना था, जिनका विश्वास परीक्षा प्रणाली में लीक और अव्यवस्थाओं ने तोड़ दिया।


प्रश्नपत्र लीक का विवाद केवल एक परीक्षा की धांधली नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे का भी हनन है, जिसके आधार पर युवा वर्षों तक तैयारी करते हैं।


यदि हम मान लें कि सभी परीक्षाएँ निष्पक्ष हो जाएं, तो क्या हमारी शिक्षा प्रणाली सफल मानी जाएगी? शायद नहीं। परीक्षा और शिक्षा एक ही चीज़ नहीं हैं। परीक्षा चयन करती है, जबकि शिक्षा निर्माण करती है।


आज की प्रतियोगी परीक्षाएँ अवसरों की कमी का प्रबंधन बन गई हैं। जब एक सीट के लिए हजारों उम्मीदवार खड़े होते हैं, तो यह योग्यता का नहीं, बल्कि अवसरों की कमी का मामला बन जाता है।


सोनम वांगचुक का आंदोलन केवल परीक्षा प्रणाली की जवाबदेही नहीं मांगता, बल्कि यह उस सोच पर भी प्रश्न उठाता है, जिसने शिक्षा को छँटाई की मशीन बना दिया है।


सोनम वांगचुक ने अपनी यात्रा विरोध से नहीं, बल्कि निर्माण से शुरू की। उन्होंने लद्दाख में SECMOL की स्थापना की, जहाँ उन्होंने शिक्षा को स्थानीय संदर्भ में ढालने का प्रयास किया।


उनका नैतिक प्रभाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उन्होंने पहले काम किया और फिर अपनी आवाज उठाई। शिक्षा, पर्यावरण और लोकतांत्रिक जवाबदेही के मुद्दे एक ही विचार के तहत काम करते हैं—विकास मनुष्य के लिए होना चाहिए, न कि मनुष्य विकास के लिए।


क्या भारतीय गणतंत्र नागरिकों की आवाज सुनने में सक्षम है?


सोनम वांगचुक का महत्व उनके काम में नहीं, बल्कि उस नागरिकता में है जिसका वे प्रतिनिधित्व करते हैं। वे किसी राजनीतिक दल के नेता नहीं हैं, फिर भी वे राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आते हैं।


लोकतंत्र में असहमति पर बहस करना आवश्यक है। किसी नागरिक की बात केवल इसलिए गलत नहीं हो जाती कि उसने कभी किसी सरकार का समर्थन किया।


सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल लोकतंत्र की विफलता को उजागर करती है। कोई भी स्वस्थ लोकतंत्र नहीं चाहेगा कि नागरिक को अपनी बात मनवाने के लिए अपने जीवन को दाँव पर लगाना पड़े।


भारतीय लोकतंत्र की विडंबना यह है कि हम नागरिक से स्पष्टीकरण मांगते हैं, लेकिन सरकार से अपेक्षा कम होती जा रही है कि वह बताए कि समस्या इतनी दूर क्यों बढ़ी।


सोनम वांगचुक का प्रश्न यह है कि क्या इस गणतंत्र में ऐसा स्थान बचा है जहाँ एक जिम्मेदार नागरिक की बात सुनी जाए, या उसे अपनी बात मनवाने के लिए अपने शरीर को अंतिम तर्क बनाना होगा?