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सोनम वांगचुक का भूख हड़ताल: सरकार की अनदेखी और आंदोलन की चुनौतियाँ

सोनम वांगचुक ने जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की है, लेकिन सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दे रही है। सीजेपी का आंदोलन भी पहचान बनाने में असफल रहा है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे आंदोलन का नैरेटिव बदल गया और क्यों यह मुद्दा व्यापक समर्थन नहीं जुटा सका। क्या सरकार को इस बार भी अनदेखी करनी चाहिए? जानें इस महत्वपूर्ण विषय पर।
 

सोनम वांगचुक का आंदोलन


सोनम वांगचुक ने जंतर मंतर पर भूख हड़ताल शुरू की है, जबकि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) प्रदर्शन कर रही है। लेकिन सरकार इस पर ध्यान नहीं दे रही है। पिछले साल, किसानों ने भी अपनी मांगों को लेकर दिल्ली में एक साल तक डेरा डाला था, जिसमें कई किसानों की मृत्यु हुई। तब सरकार ने उनकी बात तब सुनी जब उत्तर प्रदेश और पंजाब के चुनाव नजदीक आए। उस आंदोलन में किसानों की पहचान उनके हितों के लिए संघर्ष करने के रूप में बनी थी।


किसानों की अस्मिता का मुद्दा बन गया था, जिसके परिणामस्वरूप सरकार ने तीन विवादित कृषि कानूनों को वापस लिया। इसके विपरीत, सीजेपी का आंदोलन अभी तक कोई पहचान नहीं बना पाया है। इसके मुद्दे भी सीमित हैं और कोई जातीय या सामाजिक समूह इससे नहीं जुड़ा है। सीजेपी का सोशल मीडिया समर्थन भी ठंडा पड़ गया है।


सीजेपी और सोनम वांगचुक का मुख्य मुद्दा राजनीतिक है। सीजेपी के प्रमुख ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा, जिससे आंदोलन का नैरेटिव बदल गया। असली मुद्दा शिक्षा और परीक्षा में सुधार होना चाहिए था। हालांकि, यह संदेश फैल गया कि आंदोलन केवल शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के लिए है।


नीट यूजी परीक्षा के परिणाम आने वाले हैं और एनटीए ने अगले साल के लिए बदलावों की जानकारी दी है। 12वीं की बोर्ड परीक्षा की ऑनस्क्रीन मार्किंग का विवाद भी समाप्त हो गया है। इस प्रकार, आंदोलन का मुद्दा अब लोकप्रिय विमर्श से बाहर हो गया है।


सरकार को आंदोलनकारियों से संवाद करना चाहिए, भले ही वह किसी मंत्री के इस्तीफे पर सहमत न हो। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में असहमति और प्रतिरोध की आवाज़ों को सुनना आवश्यक है। सोनम वांगचुक ने लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए भी आंदोलन किया था, लेकिन सरकार ने उस पर भी ध्यान नहीं दिया।


विपक्ष का सहयोगात्मक रवैया भी इस आंदोलन के लिए नहीं है। कुछ विपक्षी नेता जंतर मंतर पहुंचे, लेकिन उनका समर्थन प्रतीकात्मक है। सीजेपी ने विपक्ष को भरोसे में नहीं लिया, जिससे कांग्रेस ने इसका विरोध किया। सोनम वांगचुक एक समय मोदी सरकार के समर्थक रहे हैं।


इसलिए, यह आवश्यक है कि विपक्ष भी पहल करे। किसी भी आंदोलन की सफलता के लिए राजनीतिक समर्थन जरूरी है।