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स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों को दास्तानगोई में जीवित कर रहे डॉ. हिमांशु और डॉ. प्रज्ञा

डॉ. हिमांशु बाजपेयी और डॉ. प्रज्ञा शर्मा स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों को दास्तानगोई के माध्यम से जीवित कर रहे हैं। उनकी प्रस्तुतियों में काकोरी एक्शन, झांसी की रानी और महात्मा गांधी जैसी महत्वपूर्ण घटनाएँ शामिल हैं। यह कला न केवल इतिहास को जीवित रखती है, बल्कि नई पीढ़ी को भी प्रेरित करती है। जानें कैसे ये कलाकार अपनी दास्तानों के माध्यम से देश की आज़ादी की कहानियों को लोगों के बीच ला रहे हैं।
 

दास्तानगोई की कला का पुनरुत्थान


दास्तानगोई की कला, जो कभी तिलिस्मी कहानियों के लिए जानी जाती थी, अब स्वतंत्रता आंदोलन की कहानियों को जीवित कर रही है। फिल्मी हस्तियों, उर्दू-हिंदी साहित्यकारों, पौराणिक कथाओं और लोक कथाओं के साथ-साथ, डॉ. हिमांशु बाजपेयी और डॉ. प्रज्ञा शर्मा स्वतंत्रता संग्राम की कहानियों को अपनी दास्तानों में समाहित कर रहे हैं।


कहानियां इस देश की संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हैं। लोग अपनी बातों को कहानियों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि दास्तानगोई की कला पुनर्जीवित हो रही है। लेकिन क्या भारत केवल इन कहानियों से बना है? इसका उत्तर देते हैं डॉ. हिमांशु बाजपेयी।


लखनऊ के निवासी डॉ. हिमांशु इस कला को लोगों के बीच लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। उनकी पहचान पत्रकारिता और 'किस्सा किस्सा लखनऊवा' के लेखक के रूप में भी है।


उनका सबसे बड़ा योगदान स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित दास्तानें हैं, जिसमें डॉ. प्रज्ञा शर्मा भी उनके साथ हैं।


ये दोनों कलाकार पिछले कई वर्षों से देश-विदेश में स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ी कहानियों को दास्तानगोई के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे हैं। इनमें काकोरी एक्शन 1925, झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, महात्मा गांधी, और जलियांवाला बाग़ हत्याकांड जैसी कहानियां शामिल हैं।


डॉ. हिमांशु कहते हैं, 'हम चाहते हैं कि देश की आज़ादी की कहानी लोगों के दिलों में बसी रहे, ताकि यह उनके लिए दूर की बात न हो।'


किस्सागोयों का एक राष्ट्र की स्मृति को संजोए रखने में महत्वपूर्ण योगदान होता है। ये स्मृतियां एक राष्ट्र को प्रेरित करती हैं।


डॉ. हिमांशु और डॉ. प्रज्ञा के पास 45 से अधिक दास्तानें हैं, जिनमें से 15 स्वतंत्रता संग्राम पर आधारित हैं।


प्रज्ञा कहती हैं, 'बच्चों को राष्ट्रीय आंदोलन के किस्से जानना बहुत ज़रूरी है।' वे स्कूलों में दास्तान सुनाने का कोई मौका नहीं छोड़तीं।


डॉ. हिमांशु की पहली प्रस्तुति 'दास्तान-ए-तमन्ना-ए-सरफरोशी' थी, जिसमें उन्होंने काकोरी एक्शन पर तीन साल का शोध किया।


प्रज्ञा ने झांसी की रानी की दास्तान में अपनी आवाज़ दी, जिससे उनकी दास्तानें और भी लोकप्रिय हुईं।


लोकगायक पद्मश्री प्रहलाद सिंह टिपानिया ने भी इन दास्तानों की सराहना की है।