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स्वामी विवेकानंद: एक प्रेरणादायक युवा नेता की कहानी

स्वामी विवेकानंद, जिन्होंने अपने अल्प जीवन में भारत की संस्कृति और अध्यात्म को विश्व स्तर पर प्रस्तुत किया, आज भी युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उनका संदेश, 'उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो जाए', आज भी युवाओं को प्रेरित करता है। 12 जनवरी को उनके जन्मदिन को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है, जो भारत की युवा शक्ति और रचनात्मकता का प्रतीक है।
 

स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण

स्वामी विवेकानंद ने एक ऐसे समाज की परिकल्पना की थी, जहां धर्म या जाति के आधार पर कोई भेदभाव न हो। उन्हें आत्मा और परमात्मा में गहरा विश्वास था। उनके अनुसार, विभिन्न स्रोतों से निकलकर सभी नदियाँ अंततः समुद्र में मिल जाती हैं, इसी तरह विभिन्न रुचियों और रास्तों से चलने वाले लोग भी अंत में परमात्मा में समाहित हो जाते हैं।


स्वामी विवेकानंद का जीवन और योगदान

स्वामी विवेकानंद (12 जनवरी 1863 - 4 जुलाई 1902) ने अपने 39 वर्षों के जीवन में भारत की संस्कृति, अध्यात्म और दर्शन को विश्व स्तर पर प्रस्तुत किया। वे न केवल एक महान संत और आध्यात्मिक गुरु थे, बल्कि एक देशभक्त, वक्ता और मानवता के प्रेमी भी माने जाते हैं।


उन्होंने 1893 में शिकागो में आयोजित विश्व धर्म महासभा में भारत का प्रतिनिधित्व किया, जहां उनके भाषण ने उन्हें विश्व स्तर पर प्रसिद्धि दिलाई। उनका जन्म एक कुलीन बंगाली परिवार में हुआ था, और वे रामकृष्ण परमहंस के प्रिय शिष्य थे।


सेवा का संदेश

स्वामी विवेकानंद ने अपने गुरु से सीखा कि सभी जीवों में परमात्मा का अस्तित्व है। इसलिए, मानवता की सेवा करना परमात्मा की सेवा करना है। उन्होंने 1 मई 1897 को रामकृष्ण मिशन की स्थापना की, जो आज भी उनके विचारों का प्रचार कर रहा है।


युवाओं के लिए प्रेरणा

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में युवाओं को प्रेरित करने का कार्य किया। उनके विचारों को ध्यान में रखते हुए, 1984 में संयुक्त राष्ट्र ने अंतर्राष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया। भारत सरकार ने 12 जनवरी को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया।


स्वामी विवेकानंद की 163वीं जयंती 12 जनवरी 2026 को मनाई जाएगी, जो युवाओं के लिए रचनात्मकता और नेतृत्व का प्रतीक है।


शिक्षा और अध्ययन

स्वामी विवेकानंद ने अपनी शिक्षा की शुरुआत 1871 में की और विभिन्न विषयों में गहरी रुचि दिखाई। उन्होंने भारतीय और पश्चिमी दर्शन का तुलनात्मक अध्ययन किया और कई महत्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की।


ध्यान और अंतिम समय

स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में भी ध्यान की दिनचर्या को नहीं छोड़ा। 4 जुलाई 1902 को उन्होंने ध्यानावस्था में महासमाधि ली।


स्वामी विवेकानंद का संदेश

स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत एक बार फिर समृद्धि और शक्ति की ऊँचाइयों पर पहुंचेगा। उनका मानना था कि भारत का विश्व गुरु बनना न केवल भारत के लिए, बल्कि पूरे विश्व के लिए लाभकारी होगा।