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हरदीप सिंह पुरी की राजनीतिक स्थिति पर संकट के बादल

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी की राजनीतिक स्थिति में संकट के बादल छा गए हैं। अमेरिका में एपस्टीन फाइल्स के खुलासे और ईरान युद्ध से जुड़े सवालों ने उनकी मुश्किलें बढ़ा दी हैं। भाजपा ने आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सिख नेताओं को आगे लाने की तैयारी शुरू कर दी है। क्या हरदीप पुरी की भूमिका कम हो रही है? जानें इस लेख में उनके भविष्य की राजनीतिक रणनीतियों के बारे में।
 

हरदीप सिंह पुरी की मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं

केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी के लिए अच्छे दिन खत्म होते नजर आ रहे हैं। पहले वे संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि रहे, फिर भाजपा में शामिल होकर अमृतसर से चुनाव लड़े। हारने के बावजूद, उन्हें केंद्र में मंत्री पद मिला और उत्तर प्रदेश से राज्यसभा भेजा गया। वे शहरी विकास और पेट्रोलियम जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार संभालते रहे हैं। हाल के समय में उनकी स्थिति बिगड़ती जा रही है।


अमेरिका में एपस्टीन फाइल्स के खुलासे के बाद उनके कई पत्राचार सामने आए हैं, जिससे कांग्रेस ने उनके ईमेल्स को सार्वजनिक किया। हालांकि, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भाजपा ने इस्तीफे का कोई नियम नहीं बनाया है, जिससे वे इस मामले में बच गए हैं। लेकिन अगर मंत्री नैतिकता दिखाते हैं, तो इस्तीफा देना अलग बात है, जैसा कि एमजे अकबर ने मी टू अभियान के दौरान किया था। हरदीप पुरी ने इस्तीफा नहीं दिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे सुरक्षित हैं।


आगामी चुनौतियाँ और संभावित बदलाव

उनकी समस्याएँ केवल एपस्टीन फाइल्स तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ईरान युद्ध से भी जुड़े सवालों का सामना कर रहे हैं। पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय उनके पास है, और देश में तेल और गैस की कमी से लोग परेशान हैं। सरकार को ऐसे व्यक्ति की तलाश होगी, जिसे बलि का बकरा बनाया जा सके, और हरदीप पुरी उस भूमिका में आ सकते हैं।


भाजपा ने अगले साल पंजाब विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सिख नेताओं को आगे लाने की तैयारी शुरू कर दी है। एचएस फुल्का का भाजपा में शामिल होना इसी दिशा में एक संकेत है। हरदीप पुरी का राज्यसभा कार्यकाल इस साल नवंबर में समाप्त होगा, और संभावना है कि इससे पहले उनका मंत्री पद चला जाए।


भविष्य की राजनीतिक रणनीतियाँ

फुल्का की छवि सिख समुदाय में सकारात्मक है, और उन्होंने दिल्ली के सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों का मुकदमा लड़ा था। अगर भाजपा उन्हें राज्यसभा भेजती है, तो इसका लाभ पार्टी को मिलेगा। इससे पहले, अमेरिका में भारत के राजदूत रहे तरणजीत सिंह संधु को दिल्ली का उप राज्यपाल बनाया गया। यह सब पंजाब चुनाव की तैयारी का हिस्सा है। हरदीप सिंह पुरी की भूमिका कम होती जा रही है, और नए चेहरे आगे आ रहे हैं।