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हरियाणा सरकार की 'स्टिल्ट प्लस 4' नीति पर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार की 'स्टिल्ट प्लस 4' नीति पर रोक लगाते हुए कहा है कि सरकार ने बुनियादी ढांचे की वास्तविकता को नजरअंदाज किया है। यह निर्णय उन निवासियों के लिए राहत लेकर आया है जो बढ़ती जनसंख्या और घटती सुविधाओं से परेशान थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विकास के नाम पर लोगों की जीवन गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता। जानें इस फैसले का आम जनता पर क्या प्रभाव पड़ेगा और क्या नई निर्माण योजनाओं पर रोक लगेगी।
 

हरियाणा सरकार की नीति पर कोर्ट की रोक

गुरुग्राम, 03 अप्रैल। पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने हरियाणा सरकार की 'स्टिल्ट प्लस 4' मंजिल नीति पर कड़ा निर्णय लिया है। चीफ जस्टिस शील नागू और जस्टिस संजीव बेरी की खंडपीठ ने इस नीति पर रोक लगाते हुए कहा कि राज्य सरकार ने बुनियादी ढांचे की वास्तविकता को पूरी तरह से नजरअंदाज किया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा लगता है कि हरियाणा सरकार ने केवल अधिक राजस्व के लिए आम जनता की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। यह निर्णय उन हजारों निवासियों के लिए राहत लेकर आया है, जो रिहायशी क्षेत्रों में बढ़ती भीड़ और घटती सुविधाओं से परेशान थे।


गुरुग्राम और फरीदाबाद में बुनियादी ढांचे पर दबाव

इस नीति के तहत आवासीय प्लॉटों पर स्टिल्ट के साथ चार मंजिलों के निर्माण की अनुमति दी गई थी, जबकि पहले केवल तीन मंजिलों का प्रावधान था। गुरुग्राम, फरीदाबाद, हिसार और रोहतक की रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन (RWA) ने लंबे समय से इसका विरोध किया है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि पुराने सेक्टरों की सीवरेज लाइन, पानी की सप्लाई और बिजली ग्रिड इस अतिरिक्त जनसंख्या का बोझ सहन करने के लिए तैयार नहीं हैं। ऊंची इमारतों के कारण न केवल धूप और ताजी हवा में बाधा आ रही है, बल्कि संकरी गलियों में पार्किंग और ट्रैफिक जाम की समस्या भी बढ़ गई है।


विशेषज्ञ पैनल की सिफारिशों की अनदेखी

राज्य सरकार ने 2023 में एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया था, जिसने इस नीति पर कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए थे। समिति ने सिफारिश की थी कि S+4 निर्माण की अनुमति केवल तभी दी जाए जब बुनियादी ढांचे का ऑडिट और सुदृढ़ीकरण किया गया हो। पैनल ने इमारतों की ऊंचाई कम करने, केवल पारिवारिक आवास के लिए अनुमति देने और स्टिल्ट पार्किंग के दुरुपयोग को रोकने के लिए त्वरित प्रतिक्रिया टीम बनाने की बात कही थी। हाईकोर्ट ने पाया कि सरकार ने इन आवश्यक पहलुओं और 'इंफ्रास्ट्रक्चर क्षमता ऑडिट' को नजरअंदाज कर गुरुग्राम जैसे शहरों में निर्माण की अनुमति दी, जहां पहले से ही संसाधनों की भारी कमी है।


आम आदमी पर प्रभाव

कोर्ट के इस आदेश के बाद अब नए बिल्डिंग प्लान की मंजूरी पर प्रश्नचिन्ह लग गया है। जिन लोगों ने पहले से निर्माण शुरू कर दिया है या जिनके नक्शे पास हो चुके हैं, वहां भी इंफ्रास्ट्रक्चर ऑडिट की अनिवार्यता लागू हो सकती है। आम जनता के लिए इसका सीधा मतलब है कि अब रिहायशी इलाकों में बेतरतीब कंक्रीट के जंगल खड़ा करना आसान नहीं होगा। कोर्ट का स्पष्ट संदेश है कि विकास के नाम पर रिहायशी क्षेत्रों के मूल स्वरूप और वहां रहने वाले लोगों की जीवन गुणवत्ता से समझौता नहीं किया जा सकता।


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