हिंदू-मुस्लिम संबंधों में ऐतिहासिक संघर्ष और वर्तमान चुनौतियाँ
हिंदू-मुस्लिम रिश्तों की जटिलता
यह सच है कि कई मुस्लिम समुदाय शांति से जीना चाहते हैं, लेकिन इस्लामी सिद्धांत में सभी ईश्वर को एक मानने की संभावना बहुत कम है। यही कारण है कि एक पक्ष संघर्ष और अपमान को याद करता है, जबकि दूसरा गर्व से उस पर नजर डालता है। यह स्थिति हिंदू-मुस्लिम संबंधों में जहर घोलती है। अतीत को बदला नहीं जा सकता, लेकिन क्या हमें ऐतिहासिक अपराधों और उनके दोषियों का महिमामंडन करना चाहिए?
प्रधानमंत्री मोदी का सोमनाथ मंदिर पर भाषण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 जनवरी को सोमनाथ मंदिर के इतिहास को याद करते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने इस मंदिर की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी थी। उन्होंने कहा कि सोमनाथ महादेव मंदिर पर ध्वजारोहण भारत की शक्ति को दर्शाता है। मोदी ने कहा, "गजनी से लेकर औरंगजेब तक के कट्टरपंथियों को यह भ्रम था कि उन्होंने सोमनाथ को जीत लिया है, लेकिन वे इतिहास के पन्नों में सिमट गए हैं।"
आक्रांता और उनकी मानसिकता
प्रधानमंत्री मोदी ने सही कहा कि आक्रांता इतिहास बन गए हैं, लेकिन क्या गजनवी और औरंगजेब की मानसिकता भी समाप्त हो गई? क्या नफरत और कट्टरता का जहर आज भी इस भूमि पर मौजूद है? इस विषैली सोच के कई उदाहरण आज भी देखने को मिलते हैं, जैसे कश्मीरी पंडितों का नरसंहार और 26/11 का आतंकवादी हमला।
इस्लामी आक्रमणों के उद्देश्य
भारत पर इस्लामी आक्रमण दो मुख्य उद्देश्यों से हुए: धन-संपत्ति की लूट और मजहबी दायित्व की पूर्ति। तैमूर ने अपनी आत्मकथा में इन उद्देश्यों का उल्लेख किया है। गजनवी ने भारत में मूर्तिपूजकों के खिलाफ जिहाद करने की कसम खाई थी और उसने अपने शासनकाल में कई बार आक्रमण किए।
वर्तमान भारत में स्थिति
भारत में हिंदू और मुस्लिम दोनों की कुल जनसंख्या लगभग 95 प्रतिशत है, इसलिए उन्हें शांति और समानता के साथ रहना होगा। हालांकि, इतिहास की कड़वी यादें उन्हें बार-बार आमने-सामने खड़ा कर देती हैं। इस्लाम भारत में एक राजनीतिक-सैन्य मजहबी शक्ति के रूप में आया, जिसने हिंदू सभ्यता को प्रभावित किया।
आत्मसमीक्षा की आवश्यकता
हालांकि कई मुस्लिम शांति से रहना चाहते हैं, इस्लामी सिद्धांत में सभी ईश्वर को एक मानने की गुंजाइश कम है। पिछले कुछ दशकों में ईसाइयत ने अपनी त्रासदियों पर पश्चाताप की प्रक्रिया अपनाई है, लेकिन इस्लाम में ऐसी आत्मसमीक्षा की कमी है।
भविष्य की चुनौतियाँ
1947 का विभाजन हिंदू-मुस्लिम के बीच सभ्यतागत टकराव का परिणाम था। पाकिस्तान और बांग्लादेश इस्लामी राष्ट्र बन गए, जबकि भारत में 'दो-राष्ट्र सिद्धांत' की मानसिकता आज भी जीवित है। शांति तभी संभव है जब हम इतिहास को ईमानदारी से देखें और घृणा फैलाने वाली मानसिकता पर खुली बहस करें।