हिन्दू और मुस्लिम नेताओं की राजनीति में भिन्नताएँ
हिन्दू और मुस्लिम नेताओं की भिन्नताएँ
हिन्दू और मुस्लिम नेताओं के व्यवहार, शैलियों और उपलब्धियों में अंतर को ‘भारतीयता’ के नाम पर नहीं रखा जा सकता। यह सीधे-सीधे हिन्दू और मुस्लिम नेताओं के बीच की भिन्नताएँ हैं। हिन्दू नेता पिछले एक सौ बीस वर्षों से राजनीति में सक्रिय हैं, लेकिन वे स्तरीय राजनीति का क-ख-ग भी नहीं सीख पाए हैं। हिन्दू नेता धर्म को छोड़कर पाखंड पर निर्भर रहते हैं, जिससे उनका समाज प्रभावित होता है। वे सत्ता और दिखावे के लिए अपनी असफलताओं को छिपाते हैं।
हिन्दू राजनीति का दिवालियापन
भारत में हिन्दू नेताओं का भोलापन और अहंकार एक स्थायी तत्व बन चुका है। इसमें विभिन्न प्रकार के हिन्दू शामिल हैं: गाँधीवादी, संघी, वामपंथी। जबकि मुस्लिम नेताओं में यह भोलापन नहीं पाया जाता।
मुस्लिम नेता कभी भी राष्ट्रवाद, समाजवाद, या लोकतंत्र की बातें नहीं करते। इसलिए उनके अनुयायी ठोस मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे सत्ता या विशेषाधिकार के लिए जो भी उचित समझते हैं, करते हैं।
इसके विपरीत, हिन्दू नेता केवल कुर्सी और सत्ता की सुख-सुविधाओं के लिए प्रयासरत रहते हैं। वे ‘सेवा’ और ‘सिद्धांत’ का दिखावा करते हैं, लेकिन असल में वे समस्याओं का समाधान करने में असफल रहते हैं।
यह स्थिति पिछले एक सौ छः वर्षों से जारी है। हिन्दू नेताओं के खाते में कई बड़ी भूलें और राष्ट्रीय हानियाँ हैं, जिनका जिम्मेदार वे स्वयं हैं।
तुलना में, मुस्लिम नेताओं ने साधारण प्रयासों से बड़ी सफलताएँ हासिल की हैं। उन्होंने न तो किताबें लिखी हैं, न ही आदर्शों का प्रचार किया है, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्यों को प्राप्त किया है।
हिन्दू नेताओं की घोषणाएँ अक्सर कोरी बातें होती हैं, जिनमें निष्ठा का अभाव होता है। वे अपनी बातों के लिए कभी भी गंभीर नहीं होते।
हालांकि दोनों भारतीय हैं, हिन्दू और मुस्लिम नेताओं की आदतों और शैलियों में स्पष्ट अंतर है। मुस्लिम नेता सदियों से राजनीति में माहिर हैं, जबकि हिन्दू नेता अभी भी सीखने की प्रक्रिया में हैं।
मुस्लिम नेता चुपचाप इस्लामी बढ़त के लिए काम करते हैं, जबकि हिन्दू नेता व्यक्तिगत लाभ और कुर्सी के लिए प्रयासरत रहते हैं।
हिन्दू नेताओं की यह प्रवृत्ति दलीय विभेदों से ऊपर है। जबकि मुस्लिम नेताओं में ऐसे पदलोभी नेता खोजना कठिन है।
हिन्दू नेता धर्म को केवल आडंबर मानते हैं, जबकि मुस्लिम नेता अपने धर्म का पालन करते हैं। यही कारण है कि मुस्लिम नेता सफल होते हैं।
हिन्दू नेताओं की यह दुर्बलता हिन्दू धर्म की कमजोरी नहीं है, बल्कि धर्म को उपेक्षित करने की आदत से उत्पन्न हुई है।
इसलिए हिन्दू नेता अपनी गलत नीतियों के लिए जिम्मेदारी नहीं लेते और सत्ता में बने रहते हैं।
भारत में प्रभावी मुस्लिम नेता बदलते रहते हैं, जबकि हिन्दू नेता लंबे समय तक बने रहते हैं।
हिन्दू नेताओं की सिद्धांतहीनता और चरित्रविहीनता उनके अनुयायियों द्वारा भी स्वीकार की जाती है।
इस प्रकार, हिन्दू राजनीति एक पतवार विहीन नाव की तरह है, जो बदलती हवाओं के अनुसार चलती है।
हिन्दू नेताओं में सामूहिक कसौटी का अभाव है, जिससे वे किसी भी दबाव का सामना नहीं कर पाते।
यह भोलापन हिन्दू नेताओं में पिछले सौ वर्षों से बना हुआ है।