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हिमाचल प्रदेश और बिहार: गांवों की खोई हुई पहचान

हिमाचल प्रदेश और बिहार में गांवों की स्थिति चिंताजनक है। शहरीकरण की कमी के बावजूद, गांवों से लोग बेहतर जीवन की तलाश में शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। हाल ही में एक वायरल वीडियो में बिहार के किसान अपनी कठिनाइयों को साझा कर रहे हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी के कारण गांवों की सामाजिक स्थिति भी बिगड़ रही है। जानें इस मुद्दे की गहराई में क्या है।
 

गांवों का लुप्त होना


हिमाचल प्रदेश देश का सबसे कम शहरीकरण वाला राज्य है, इसके बाद बिहार का स्थान है। इसके अलावा असम और ओडिशा जैसे राज्य भी शामिल हैं। इन क्षेत्रों में शहरीकरण की कमी है, लेकिन गांवों की स्थिति चिंताजनक है। हाल ही में एक वायरल वीडियो में, पंजाब में धान की रोपाई कर रहे बिहार के किसान अपनी कठिनाइयों को साझा कर रहे थे। उन्होंने बिहार के युवाओं से अपील की कि वे शिक्षा प्राप्त करें और अपने जीवन को बेहतर बनाएं। यह सवाल उठता है कि आखिर गांव के लोग कहां चले गए हैं?


शहरों की ओर पलायन

गांवों से लोग केवल बड़े शहरों की ओर नहीं गए हैं, बल्कि वे अपने आस-पास के छोटे शहरों में भी चले गए हैं। बेहतर जीवन, बच्चों की शिक्षा और बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं की तलाश में, लोग गांव छोड़कर शहरों की ओर बढ़ रहे हैं। श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' में पहले पन्ने पर लिखा गया है कि 'शहर का वह छोर, जहां से देहात का महासागर शुरू होता है', लेकिन अब यह महासागर कहीं दिखाई नहीं देता।


शहरीकरण की चुनौतियां

शहरों का भौगोलिक विस्तार तेजी से हुआ है, लेकिन सुविधाओं में कोई सुधार नहीं हुआ है। जैसे-जैसे दिल्ली की जनसंख्या बढ़ी, एनसीआर का दायरा भी बढ़ा। लेकिन नगर निगमों ने गांवों को वही सुविधाएं नहीं दी, जो पंचायतों में मिलती थीं। एपीजे अब्दुल कलाम ने 2003 में पुरा योजना का उल्लेख किया था, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में शहरी सुविधाएं प्रदान करना था। लेकिन 23 साल बाद भी गांवों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है।


शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी

गांव के लोग जिन चीजों की तलाश में शहर आए थे, वे उन्हें नहीं मिलीं। शिक्षा के नाम पर निजी स्कूलों में गुणवत्ता की कमी है और सरकारी स्कूलों की स्थिति भी खराब है। सरकारी अस्पतालों की हालत दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है, जबकि निजी अस्पतालों की फीस इतनी अधिक है कि आम लोग उसे वहन नहीं कर सकते।


गांवों की सामाजिक स्थिति

गांवों में छोटे जोत वाले किसान भी खेत मजदूरों की तलाश में भटक रहे हैं। उनके घर के युवा भी बेहतर जीवन की उम्मीद में गांव छोड़ चुके हैं। पहले जहां चौपालों पर, मंदिरों या मस्जिदों के चबूतरे पर लोग बैठे रहते थे, अब वहां सन्नाटा है। सड़क पर कुछ महिलाएं दिखती हैं, लेकिन कामकाजी उम्र के लोग लापता हैं।