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IIT दिल्ली के दीक्षांत समारोह में संस्कृत मंत्रों पर राजनीतिक विवाद

IIT दिल्ली के हालिया दीक्षांत समारोह में संस्कृत मंत्रों के पाठ को लेकर राजनीतिक बहस छिड़ गई है। कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने समारोह में धार्मिक मंत्र के पाठ पर सवाल उठाया, जबकि IIT कानपुर के पूर्व छात्र ज्ञान सी मेहता ने इसे तैत्तिरीय उपनिषद से जोड़ा। इस विवाद ने समारोह में मंत्र की पहचान और शैक्षणिक संस्थानों में धार्मिक प्रार्थनाओं की उपस्थिति पर महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया है।
 

नई दिल्ली में IIT दिल्ली का दीक्षांत समारोह


नई दिल्ली: IIT दिल्ली के हालिया दीक्षांत समारोह में संस्कृत मंत्रों के पाठ को लेकर राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। कांग्रेस की प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने इस पर सवाल उठाया कि शैक्षणिक कार्यक्रम में धार्मिक मंत्र का पाठ क्यों किया गया। इस समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी उपस्थित थे। IIT कानपुर के पूर्व छात्र ज्ञान सी मेहता ने कहा कि समारोह में गायत्री मंत्र का पाठ नहीं हुआ, बल्कि तैत्तिरीय उपनिषद के शिक्षावल्ली खंड के मंत्रों का पाठ किया गया था। अब विवाद का केंद्र इसी पहचान पर आ गया है।


शमा मोहम्मद का सवाल

शमा मोहम्मद ने सोशल मीडिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि यदि गायत्री मंत्र का पाठ हुआ, तो IIT जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के दीक्षांत समारोह में इसकी आवश्यकता क्यों थी। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा संस्थानों को सभी धर्मों के धार्मिक नारों और मंत्रों से मुक्त रहना चाहिए, हालांकि व्यक्तिगत रूप से उन्हें गायत्री मंत्र सुनने में कोई आपत्ति नहीं है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक चर्चा तेज हो गई है।


ज्ञान सी मेहता का स्पष्टीकरण

IIT कानपुर के पूर्व छात्र ज्ञान सी मेहता ने शमा मोहम्मद के दावे का विरोध किया। उन्होंने कहा कि समारोह में जो संस्कृत पाठ हुआ, वह गायत्री मंत्र नहीं था। उन्होंने इसे तैत्तिरीय उपनिषद की शिक्षावल्ली से संबंधित बताया। उनके अनुसार, इस अंतर को समझना आवश्यक है, क्योंकि मंत्र की सही पहचान के बाद ही यह तय किया जा सकता है कि समारोह में धार्मिक पाठ हुआ था या भारतीय शिक्षा परंपरा से जुड़ा कोई वैदिक संदेश दिया गया था।


मंत्र में गुरु और शिष्य की मंगलकामना

जिस मंत्र का उल्लेख किया जा रहा है, उसमें गुरु और शिष्य दोनों के संरक्षण की कामना की जाती है। इसमें ज्ञान प्राप्त करने वाले विद्यार्थी और ज्ञान देने वाले शिक्षक को एक साथ प्रार्थना में रखा गया है। शिक्षावल्ली में सत्य, कर्तव्य, अनुशासन, गुरु के सम्मान और जिम्मेदार जीवन जैसे विषयों पर भी जोर दिया गया है। इसी कारण समर्थक इसे शिक्षा पूरी होने के अवसर पर भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़कर देख रहे हैं।


57वें दीक्षांत समारोह में छात्रों की भागीदारी

IIT दिल्ली का 57वां दीक्षांत समारोह 8 अगस्त को आयोजित हुआ था। इस कार्यक्रम में 3,000 से अधिक विद्यार्थी और 587 PhD शोधार्थी शामिल हुए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए जिज्ञासा बनाए रखने, स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने और नई समस्याओं के समाधान खोजने का आह्वान किया। उनके संबोधन में शिक्षा, शोध, तकनीक, नवाचार और भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाओं जैसे विषय प्रमुख रहे।


विवाद का केंद्र: मंत्र की पहचान या शैक्षणिक परिसर?

इस विवाद ने अब दो महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। पहला, समारोह में वास्तव में कौन सा संस्कृत पाठ किया गया था। दूसरा, क्या सार्वजनिक शैक्षणिक संस्थानों के कार्यक्रमों में धार्मिक या पारंपरिक प्रार्थनाओं को जगह मिलनी चाहिए। शमा मोहम्मद इसे धार्मिक पाठ मानकर सवाल उठा रही हैं, जबकि मेहता का कहना है कि शुरुआत ही गलत पहचान से हुई है। ऐसे में व्यापक बहस से पहले पाठ की वास्तविक पहचान स्पष्ट करना सबसे जरूरी है।