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अफगानिस्तान में भारतीय दवाओं का बढ़ता वर्चस्व: पाकिस्तानी उत्पादों की जगह

दक्षिण एशिया में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं, जिसमें अफगानिस्तान अब पाकिस्तानी दवाओं से दूरी बनाकर भारतीय दवाओं को प्राथमिकता दे रहा है। एक अफगान ब्लॉगर के अनुभव के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय दवाएं न केवल सस्ती हैं, बल्कि उनके परिणाम भी बेहतर हैं। अफगानिस्तान में दवाओं की कमी के चलते भारत ने सहायता भेजी है, जिससे भारतीय कंपनियों का बाजार में प्रभाव बढ़ रहा है। जानें इस बदलाव के पीछे की कहानी और भविष्य की संभावनाएं।
 

दक्षिण एशिया में बदलते भू-राजनीतिक समीकरण

दक्षिण एशिया के भू-राजनीतिक परिदृश्य में तेजी से बदलाव आ रहा है। अफगानिस्तान, जो पहले पाकिस्तान पर निर्भर था, अब उससे दूरी बनाने की कोशिश कर रहा है। हाल के घटनाक्रमों से स्पष्ट है कि अफगानिस्तान के बाजार में पाकिस्तानी उत्पादों, विशेषकर दवाओं की मांग में कमी आ रही है, और इसकी जगह भारतीय दवाएं ले रही हैं।


अफगानिस्तान के मेडिकल स्टोरों और अस्पतालों में एक नया बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में एक अफगान ब्लॉगर के सोशल मीडिया पोस्ट ने इस बदलाव की ओर इशारा किया है, जो अफगानिस्तान के स्वास्थ्य क्षेत्र में धीरे-धीरे हो रहा है।


सस्ती दवाएं और बेहतर परिणाम

ब्लॉगर फ़ज़ल अफ़ग़ान ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि जब वे काबुल की एक फार्मेसी में 'पारोल' (Parol) खरीदने गए, तो दुकानदार ने उन्हें भारतीय दवाओं को आजमाने की सलाह दी।


उन्होंने बताया कि तुर्की में बनी 10 गोलियों के पैकेट की कीमत 40 अफ़गानी थी, जबकि भारतीय विकल्प केवल 10 अफ़गानी में उपलब्ध था। फ़ज़ल ने लिखा, "दुकानदार ने कहा कि भारतीय दवाएं न केवल सस्ती हैं, बल्कि इनके परिणाम भी बेहतर हैं।"


उन्होंने भारतीय गोलियां खरीदीं और बताया कि इससे उनका सिरदर्द जल्दी ठीक हो गया। उन्होंने यह भी कहा कि अफगानिस्तान में भारतीय दवाएं धीरे-धीरे पाकिस्तानी दवाओं की जगह ले रही हैं।


पाकिस्तानी दवाओं की घटती हिस्सेदारी

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बीच झड़पों के बाद, अफगान फार्मास्युटिकल बाजार में पाकिस्तान की हिस्सेदारी कम हो गई है। अक्टूबर-नवंबर 2025 में हाल की झड़पों के बाद, अफगानिस्तान के उप प्रधानमंत्री ने पाकिस्तानी दवाओं पर बैन लगा दिया और व्यापारियों को भारत, ईरान और मध्य एशिया से विकल्प तलाशने का निर्देश दिया।


इस समय, भारत ने अफगानिस्तान को दवाओं का निर्यात बढ़ा दिया है, जिसमें 2024-25 में $108 मिलियन की दवाएं शामिल हैं।


अफगानिस्तान की दवाओं की निर्भरता

अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति और कमजोर स्वास्थ्य सेवा प्रणाली के कारण, यह देश historically पाकिस्तान पर निर्भर रहा है। नवंबर 2025 से पहले, पाकिस्तान अफगानिस्तान में दवाओं का प्रमुख सप्लायर था।


हालांकि, पिछले साल की झड़पों के बाद, तालिबान ने पाकिस्तानी दवाओं पर बैन लगा दिया, जिससे दवाओं की भारी कमी हो गई।


भारत की सहायता

भारत ने अफगानिस्तान में दवाओं की कमी के दौरान 73 टन जीवन रक्षक मेडिकल सप्लाई भेजने की घोषणा की। यह पहली बार नहीं है जब भारत ने अफगानिस्तान को सहायता प्रदान की है।


पिछले चार वर्षों में, भारत ने 327 टन मेडिकल सप्लाई भेजी है और अफगानिस्तान में स्वास्थ्य सुविधाओं के निर्माण का भी वादा किया है।


भारतीय कंपनियों का बढ़ता प्रभाव

अफगानिस्तान को भारत का निर्यात वर्तमान में लगभग $100 मिलियन है, जो अफगानिस्तान के फार्मा बाजार का 12-15% हिस्सा है। भारतीय कंपनियां अब अफगानिस्तान में अपने पाकिस्तानी समकक्षों की जगह ले रही हैं।


हाल ही में एक समझौता हुआ है, जिसमें भारतीय फार्मा कंपनी ज़ाइडस लाइफसाइंसेज ने अफगानिस्तान के रोफी इंटरनेशनल ग्रुप के साथ $100 मिलियन का MoU साइन किया।