इंदरजीत सिंह सिद्धू: स्वच्छता के प्रति समर्पित एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व
समाज में बदलाव की प्रेरणा
समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए हमेशा उच्च पद या संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण चंडीगढ़ के इंदरजीत सिंह सिद्धू हैं, जिन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद स्वच्छता और जनसेवा को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। पंजाब पुलिस में डीआईजी के रूप में सेवा समाप्त करने के बाद, उन्होंने आराम की बजाय सड़कों और सार्वजनिक स्थानों की सफाई का अभियान शुरू किया। उनके इस समर्पण को अब देश के प्रतिष्ठित पद्मश्री पुरस्कार से मान्यता मिली है।
स्वच्छता को जीवन का उद्देश्य बनाना
इंदरजीत सिंह सिद्धू ने पिछले कई वर्षों से चंडीगढ़ और मोहाली की सड़कों पर नियमित सफाई अभियान चलाया है। लोग उन्हें प्यार से 'ब्रूम वॉरियर' के नाम से जानते हैं। हर सुबह, वह अपनी साइकिल पर झाड़ू और कचरा एकत्र करने का सामान लेकर निकलते हैं और खुद सफाई करते हैं। उनका मानना है कि स्वच्छता केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि हर नागरिक का कर्तव्य है। इस सोच ने उन्हें हजारों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना दिया है।
राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित
गणतंत्र दिवस के अवसर पर, उनके नाम की घोषणा पद्मश्री पुरस्कार के लिए की गई थी। इसके बाद, नई दिल्ली में राष्ट्रपति भवन में आयोजित नागरिक अलंकरण समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। यह पुरस्कार न केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों का प्रतीक है, बल्कि उन सभी के लिए प्रेरणा है जो समाज में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य कर रहे हैं। समारोह में उनकी सेवा यात्रा की भी सराहना की गई।
समाज को जागरूक करने की अनूठी पहल
सिद्धू का उद्देश्य केवल सफाई करना नहीं, बल्कि लोगों को इसके प्रति जागरूक करना भी है। वे अक्सर राहगीरों और स्थानीय निवासियों से बातचीत कर उन्हें साफ-सफाई बनाए रखने के लिए प्रेरित करते हैं। उनकी यह पहल धीरे-धीरे एक सामाजिक अभियान का रूप ले चुकी है। कई लोग उनके प्रयासों से प्रभावित होकर अपने आसपास के क्षेत्रों को साफ रखने की जिम्मेदारी निभाने लगे हैं, जिससे सामुदायिक भागीदारी को भी बढ़ावा मिला है।
सेवा और समर्पण की मिसाल
88 वर्ष की उम्र में भी इंदरजीत सिंह सिद्धू की ऊर्जा और प्रतिबद्धता लोगों को हैरान करती है। उन्होंने यह साबित किया है कि समाज सेवा की कोई उम्र नहीं होती। पद्मश्री सम्मान उनके वर्षों के परिश्रम, अनुशासन और जनहित के प्रति समर्पण का प्रतीक है। उनकी कहानी यह संदेश देती है कि छोटे-छोटे प्रयास भी बड़े बदलाव ला सकते हैं। आज वह केवल चंडीगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश में नागरिक जिम्मेदारी और स्वच्छता के प्रतीक बन चुके हैं.