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कॉमनवेल्थ गेम्स 2026: मुक्केबाजी में कांस्य पदक का अनोखा नियम

कॉमनवेल्थ खेलों 2026 में मुक्केबाजी के कांस्य पदक के लिए कोई अलग मैच नहीं होता। सेमीफाइनल में हारने वाले दोनों एथलीट सीधे कांस्य पदक के हकदार बनते हैं। जानें इस अनोखे नियम के पीछे की वजह, जो खिलाड़ियों की सुरक्षा और स्वास्थ्य को ध्यान में रखता है। यह नियम 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक से शुरू हुआ था और अब बड़े अंतरराष्ट्रीय आयोजनों में अपनाया जा रहा है।
 

कॉमनवेल्थ खेलों का रोमांच

नई दिल्ली: वर्तमान में कॉमनवेल्थ खेलों (2026) का उत्साह पूरी दुनिया में फैला हुआ है। 74 देशों के 3000 से अधिक एथलीट 10 विभिन्न खेलों में 215 स्वर्ण सहित कुल 1168 पदकों के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं। इन खेलों में मुक्केबाजी के मुकाबले हमेशा से दर्शकों के बीच सबसे अधिक उत्साह पैदा करते हैं। विश्वभर के मुक्केबाज रिंग में उतरकर पदकों के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रहे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि मुक्केबाजी में कांस्य पदक के लिए कोई अलग मैच नहीं होता? यह एक अनोखा नियम है, जिसके तहत सेमीफाइनल में हारने वाले दोनों एथलीट सीधे कांस्य पदक के हकदार बन जाते हैं। आइए जानते हैं इस दिलचस्प नियम के पीछे की वजह।


खिलाड़ियों की सुरक्षा का ध्यान

बॉक्सिंग एक कॉम्बैट खेल है, जिसमें मुक्केबाजों को एक-दूसरे पर कड़े प्रहार करने होते हैं। सेमीफाइनल तक पहुंचने के लिए खिलाड़ियों को पहले ही कई कठिन मुकाबले लड़ने पड़ते हैं। इस दौरान उन्हें मांसपेशियों में खिंचाव, थकान और सिर पर चोट लगने का खतरा होता है। यदि सेमीफाइनल हारने वाले खिलाड़ियों को तुरंत तीसरे स्थान के लिए रिंग में उतारा जाए, तो उन्हें ठीक होने का समय नहीं मिलेगा। ऐसे में चोटिल या कमजोर मुक्केबाज के लिए दोबारा लड़ना जानलेवा हो सकता है।


व्यस्त शेड्यूल का प्रभाव

कॉमनवेल्थ गेम्स, एशियन गेम्स और ओलंपिक जैसे बड़े आयोजनों में बॉक्सिंग का शेड्यूल बेहद सख्त होता है। मुक्केबाजों को सेमीफाइनल और फाइनल के बीच केवल एक या दो दिन का आराम मिलता है, जिससे पूरी तरह से फिट होना मुश्किल होता है। इस थकान और रिकवरी की कमी को देखते हुए तीसरे स्थान के मैच को समाप्त कर दिया गया है। अब केवल सेमीफाइनल के विजेताओं के बीच गोल्ड मेडल के लिए फाइनल मुकाबला होता है।


इतिहास में इस नियम की शुरुआत

यह नियम 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक से शुरू हुआ था। पहले तीसरे स्थान के लिए मुकाबले होते थे, लेकिन खिलाड़ियों की स्वास्थ्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए इंटरनेशनल मुक्केबाजी संघ (AIBA) ने कांस्य पदक मैच को समाप्त करने का निर्णय लिया। इसके बाद अन्य बड़े आयोजनों ने भी इस नियम को अपनाया। इससे यह सुनिश्चित होता है कि सेमीफाइनल में पहुंचने वाले मुक्केबाज का पदक जीतना तय हो जाता है, जिससे उनके मानसिक तनाव में कमी आती है।