क्वेटा जेल में बलूच नेताओं का धरना, 'फेसलेस ट्रायल' पर उठाए सवाल
क्वेटा में बलूच नेताओं का विरोध प्रदर्शन
क्वेटा: बलूचिस्तान की राजधानी में स्थित हुडा जेल में बलूच यकजेहती कमेटी (बीवाईसी) के नेताओं का धरना रविवार को लगातार नौवें दिन भी जारी रहा। संगठन ने अपने नेताओं की सेहत और सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है और कहा है कि वे अपने संवैधानिक और कानूनी अधिकारों की मांग के लिए कठिन परिस्थितियों में विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं।
बीवाईसी के अनुसार, डॉ. महरंग बलोच, बेबर्ग बलोच, शाह जी बलोच, बीबो बलोच और गुलजादी बलोच जैसे कई नेताओं ने कथित 'फेसलेस ट्रायल' और न्यायिक प्रक्रिया में अनियमितताओं के खिलाफ जेल के भीतर धरना शुरू किया था, जो अब नौवें दिन में प्रवेश कर चुका है।
संगठन का आरोप है कि बंद नेताओं ने अदालती कार्यवाहियों और उनकी ओर से नियुक्त सरकारी वकीलों को स्वीकार करने से साफ इनकार किया था। इसके बावजूद, उनकी सहमति के बिना सुनवाई जारी रखी गई और राज्य द्वारा नियुक्त वकीलों को उन पर थोप दिया गया।
बीवाईसी ने कहा, 'फेसलेस ट्रायल पारदर्शी न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है और इससे आरोपियों का अपनी कानूनी रक्षा करने का बुनियादी अधिकार प्रभावित होता है। परिवारों को अपने प्रियजनों से मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही है और न्यायिक प्रक्रिया सार्वजनिक निगरानी से दूर संचालित की जा रही है, जिससे निष्पक्षता और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।'
संगठन के अनुसार, महरंग बलोच और अन्य बंद नेता पिछले नौ दिनों से भीषण गर्मी और बुनियादी सुविधाओं की कमी के बीच शांतिपूर्ण धरना दे रहे हैं। उनका मुख्य उद्देश्य निष्पक्ष और पारदर्शी सुनवाई सुनिश्चित करना तथा अपने कानूनी अधिकारों की बहाली है।
रविवार को जेल से जारी एक बयान में महरंग बलोच ने कहा, '13 जून को अदालत में पेशी के दौरान पता चला कि मेरे मामलों को फेसलेस ट्रायल में स्थानांतरित किया जा रहा है। इस फैसले के विरोध में मैंने तुरंत प्रदर्शन शुरू किया और बैरकों में लौटने से इनकार कर दिया।'
महरंग ने कहा कि यह धरना उन्हें बलूच आंदोलन के लंबे संघर्ष की याद दिलाता है, जिसमें लोगों ने जबरन गायब किए जाने, हत्याओं, दमन और राज्य हिंसा के बावजूद अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाई। उन्होंने कहा कि वे उन सभी लोगों को याद करती हैं जिन्होंने कठिन परिस्थितियों में भी अपने संघर्ष को जारी रखा।
उन्होंने बताया कि उनकी दो प्रमुख मांगें हैं। पहली, मामलों की सुनवाई खुली अदालत में की जाए और दूसरी, आतंकवाद निरोधी अदालत के न्यायाधीश मुहम्मद अली मुबीन का तबादला किया जाए।
महरंग बलोच ने हाल ही में आतंकवाद निरोधी कानून में किए गए संशोधनों पर भी चिंता व्यक्त की। उनका कहना है कि बलूचिस्तान विधानसभा द्वारा पारित बदलावों के बाद केवल संदेह के आधार पर भी किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखा जा सकता है, जिससे नागरिक अधिकारों और न्यायिक प्रक्रिया को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं।