गेहूं की फसल में रोगों और खरपतवारों का नियंत्रण: किसानों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी
गेहूं की फसल में रोगों और खरपतवारों का नियंत्रण
गेहूं की फसल का प्रबंधन: गेहूं की खेती करने वाले किसानों के लिए अच्छी उपज प्राप्त करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है। बुवाई के बाद, मुख्य फसल के साथ कई प्रकार के खरपतवार उग आते हैं, जो उत्पादन में कमी का कारण बनते हैं।
इन अवांछित पौधों में गोयला, चील, प्याजी, मोरवा, गुल्ली डंडा, बथुआ, अकरी, वनबट्टी, कृष्णनील और जंगली जई शामिल हैं। ये खरपतवार मुख्य फसल के साथ पोषक तत्वों, मिट्टी की नमी और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं।
इस प्रतिस्पर्धा के कारण गेहूं के पौधों का विकास बाधित होता है, जिससे उपज में कमी आती है। इसलिए, किसानों के लिए यह आवश्यक है कि वे समय पर उचित खरपतवार नियंत्रण उपाय अपनाएं।
रसायनों से खरपतवार का प्रभावी नियंत्रण
खेतों से इन जिद्दी खरपतवारों को समाप्त करने के लिए कृषि विशेषज्ञों द्वारा कई रसायनों की सिफारिश की जाती है। किसान अपनी फसल पर पेंडीमिथेलीन, सल्फोसल्फूरान, मेट्रीब्यूजिन, 2,4 डी या आइसोप्रोफ्यूरान जैसे खरपतवारनाशकों का छिड़काव कर सकते हैं। इसके अलावा, क्लोडीनोफॉप, मेटासल्फूरान, मिसोसल्फूरान और आइडोसल्फूरान का उपयोग भी प्रभावी होता है।
करनाल बंट: गेहूं का विनाशकारी कैंसर
खरपतवारों के साथ-साथ कई गंभीर बीमारियां भी गेहूं की फसल को नुकसान पहुंचा सकती हैं। इनमें सबसे खतरनाक रोग करनाल बंट है, जिसे गेहूं का कैंसर भी कहा जाता है। यह रोग बीज, मिट्टी और हवा के माध्यम से तेजी से फैलता है और इसे क्वारंटाइन के लिए प्रतिबंधित श्रेणी में रखा गया है।
करनाल बंट के लक्षण और रोकथाम
इस गंभीर बीमारी के लक्षण पौधों में फूल आने के समय स्पष्ट होते हैं। संक्रमित पौधों के दानों के चारों ओर काला पाउडर जमा हो जाता है और ट्राइमिथाइलेमाइन के कारण दानों से अजीब बदबू आती है।
इससे बचाव के लिए किसानों को करनाल बंट प्रतिरोधी किस्मों की बुवाई करनी चाहिए और फूल आने के समय सिंचाई नहीं करनी चाहिए। रासायनिक नियंत्रण के तहत बाविस्टिन और प्रोकोनोजोल का छिड़काव करना चाहिए, साथ ही बुवाई से पहले एग्रोसान-जी.एन. का बीजोपचार करना अनिवार्य है।
लूज स्मट रोग का प्रभाव और उपाय
लूज स्मट रोग लगने पर गेहूं के खेतों में जल्दी निकलने वाली बालियों पर काला पाउडर बन जाता है। इसके लक्षण पौधों के तने या पत्तियों पर नहीं, बल्कि सीधे अंडाशयों को प्रभावित करते हैं। इसकी रोकथाम के लिए रोग ग्रस्त पौधों को उखाड़कर जमीन में गाड़ देना चाहिए और सोलर उपचार विधि से बीजों को संक्रमण रहित बनाना चाहिए।
इसके अलावा, गर्म जल उपचार के तहत 540 डिग्री पर बीजों को 30 मिनट तक रखना चाहिए और फफूंदनाशक दवा से बीजोपचार करना चाहिए।