तेल संकट: वैश्विक आपूर्ति पर मंडरा रहा खतरा
तेल आपूर्ति के प्रमुख मार्गों पर संकट
तेल संकट: हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तेल टैंकरों की आवाजाही पहले से ही प्रभावित है, और अब सऊदी अरब ने अपनी महत्वपूर्ण ईस्ट-वेस्ट ऑयल पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। इसके साथ ही, यमन के हूती विद्रोही बाब अल-मंदेब क्षेत्र में अपनी स्थिति मजबूत कर रहे हैं। इन तीनों महत्वपूर्ण मार्गों पर एक साथ खतरा उत्पन्न हो गया है।
सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन, जो लगभग 1200 किलोमीटर लंबी है, फारस की खाड़ी से लाल सागर तक तेल पहुंचाने का एक बड़ा विकल्प है। हाल ही में इराक से आए ड्रोन हमलों के कारण इसे एहतियात के तौर पर बंद कर दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार, इस पाइपलाइन से पिछले कुछ महीनों में प्रतिदिन लगभग 40 से 50 लाख बैरल तेल भेजा जा रहा था।
यमन के हूती विद्रोही अब लाल सागर के मुहाने पर स्थित रणनीतिक पेरिम द्वीप तक पहुंच चुके हैं। यदि इस क्षेत्र में समुद्री मार्ग असुरक्षित हो जाता है, तो एशिया और यूरोप के बीच तेल और माल की ढुलाई पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। भारत, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है, इस संकट से प्रभावित हो सकता है। यदि खाड़ी से तेल की आपूर्ति बाधित होती है, तो परिवहन लागत में वृद्धि हो सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर असर पड़ेगा। LPG आपूर्ति पर भी पहले से ही दबाव की खबरें आ रही हैं।
सबसे बड़ा खतरा तेल की कीमतों में वृद्धि है। रिपोर्टों के अनुसार, इस संकट के बीच अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच चुकी हैं। यदि हॉर्मुज, सऊदी की वैकल्पिक पाइपलाइन और बाब अल-मंदेब पर दबाव बना रहता है, तो वैश्विक स्तर पर आपूर्ति संकट उत्पन्न हो सकता है। यह केवल मध्य पूर्व के संघर्ष का मामला नहीं है, बल्कि उस तेल का भी है, जिस पर वैश्विक अर्थव्यवस्था निर्भर करती है। अब सवाल यह है कि यदि ये तीनों मार्ग लंबे समय तक प्रभावित रहते हैं, तो क्या दुनिया में फिर से महंगे तेल और महंगाई का संकट उत्पन्न होगा, और भारत इस नए तेल संकट से कितनी सुरक्षा प्राप्त कर पाएगा?