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दिल्ली का विभाजन संग्रहालय: इतिहास की यादें और मानवीय कहानियां

दिल्ली का विभाजन संग्रहालय 1947 के विभाजन की त्रासदी और उससे जुड़े शरणार्थियों की कहानियों को संजोए हुए है। यह संग्रहालय व्यक्तिगत वस्तुओं, तस्वीरों और दस्तावेजों के माध्यम से विभाजन के दर्द को जीवित रखता है। किश्वर देसाई की मांग है कि इसे राष्ट्रीय दर्जा दिया जाए, जिससे इसके महत्व और संचालन में सहायता मिले। जानें इस संग्रहालय की विशेषताएं और इसके पीछे की मानवीय कहानियां।
 

दिल्ली का विभाजन संग्रहालय


नई दिल्ली: 15 अगस्त 1947 को भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त की, लेकिन इस आजादी के साथ देश को विभाजन का एक गहरा दर्द भी सहना पड़ा, जो आज भी लाखों परिवारों के दिलों में जीवित है। भारत और पाकिस्तान के विभाजन ने केवल भूभाग को नहीं बांटा, बल्कि लाखों लोगों को अपने घरों और परिवारों को छोड़ने के लिए मजबूर किया।


इस त्रासदी की यादों को दिल्ली का विभाजन संग्रहालय संजोए हुए है, जो कश्मीरी गेट स्थित आंबेडकर विश्वविद्यालय परिसर की दाराशिकोह लाइब्रेरी में स्थित है। यहां 1947 के विभाजन और उसके बाद शरणार्थियों के संघर्ष की कहानियां प्रदर्शित की गई हैं।


संग्रहालय की विशेषताएं

यह संग्रहालय, जिसे द आर्ट एंड कल्चरल हेरिटेज द्वारा संचालित किया जाता है, विभाजन से संबंधित व्यक्तिगत वस्तुओं, तस्वीरों, दस्तावेजों और मौखिक कहानियों को सात अलग-अलग गैलरियों में प्रदर्शित करता है।


यहां रखी गई हर वस्तु एक परिवार की कहानी को समेटे हुए है। उदाहरण के लिए, लाहौर से दिल्ली आए एक परिवार का सितार, जिसे प्रसिद्ध वाद्य निर्माता रिखी राम ने बनाया था, यहां मौजूद है। इसी तरह, लाहौर के एक पुराने घर का बिजली मीटर भी संग्रहालय में रखा गया है, जिसे एक परिवार ने इस उम्मीद में संभालकर रखा था कि कभी कोई अपना इसे लेने आएगा।


संग्रहालय में अन्य वस्तुएं

संग्रहालय में बंटवारे के समय के राशन कार्ड, कंबल, पुराने कपड़े और अन्य वस्तुएं भी प्रदर्शित हैं। इन वस्तुओं के माध्यम से उन लोगों की कठिनाइयों को समझने का प्रयास किया गया है, जिन्होंने हिंसा और असुरक्षा के बीच अपने घरों को छोड़ा और नए शहरों में जीवन की शुरुआत की।


यहां दुर्लभ तस्वीरें, अखबारों की कतरनें, थ्रीडी फिल्में और मौखिक इतिहास के जरिए विभाजन की पूरी मानवीय कहानी प्रस्तुत की गई है। संग्रहालय में उस समय की ट्रेन की प्रतिकृति भी है, जो पलायन और हिंसा के भयावह दौर की याद दिलाती है। फिल्म, संगीत और साहित्य के माध्यम से भी बंटवारे के प्रभाव को दर्शाया गया है।


किश्वर देसाई की मांग

संग्रहालय से जुड़ी किश्वर देसाई इसे राष्ट्रीय दर्जा देने की मांग कर रही हैं। उनका कहना है कि यह संग्रहालय लोगों के सहयोग से चलता है और इसके संचालन पर हर साल लगभग एक से डेढ़ करोड़ रुपये खर्च होते हैं। राष्ट्रीय दर्जा मिलने से संग्रहालय के रखरखाव और संचालन में आर्थिक सहायता मिलेगी, साथ ही इसकी महत्वता भी बढ़ेगी।


यह संग्रहालय केवल ऐतिहासिक वस्तुओं का संग्रह नहीं है, बल्कि उन लाखों लोगों की यादों का दस्तावेज है, जिन्होंने विभाजन का दर्द सहा। इसकी कहानियां यह संदेश देती हैं कि राजनीतिक सीमाएं भूमि को बांट सकती हैं, लेकिन मानव संबंधों और स्मृतियों को पूरी तरह से विभाजित नहीं कर सकतीं।