दिल्ली हाई कोर्ट का फैसला: प्राइवेट स्कूलों को फीस बढ़ाने की अनुमति
नई दिल्ली में हाई कोर्ट का महत्वपूर्ण निर्णय
नई दिल्ली: प्राइवेट स्कूलों की बढ़ती फीस से चिंतित अभिभावकों के लिए एक नया कानूनी निर्णय चर्चा का विषय बन गया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने शिक्षा विभाग के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें स्कूलों को फीस बढ़ाने से पहले विभागीय मंजूरी लेने की आवश्यकता बताई गई थी। कोर्ट ने इस प्रक्रिया को गलत सोच पर आधारित बताते हुए इसे कानूनन कमजोर माना है।
इस फैसले के बाद गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूलों को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, लाखों अभिभावकों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि क्या भविष्य में स्कूल फीस पर नियंत्रण और कठिन हो जाएगा। इस निर्णय के बाद शिक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस शुरू हो गई है।
कोर्ट का निर्णय
अदालत ने क्या कहा?
दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि निजी और गैर-सरकारी स्कूल सत्र की शुरुआत में सरकारी अनुमति के बिना फीस बढ़ा सकते हैं। पीठ ने कहा कि शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में शुल्क बढ़ाने वाले स्कूलों को सत्र शुरू होने से पहले शिक्षा विभाग को प्रस्तावित शुल्क का विवरण प्रस्तुत करना होगा।
कोर्ट ने यह भी कहा कि निजी गैर-सहायता प्राप्त मान्यता प्राप्त स्कूलों को शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में शुल्क वृद्धि के लिए शिक्षा निदेशालय (DOI) से पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। यह कदम केवल तभी आवश्यक है जब वे चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान शुल्क वृद्धि लागू करना चाहते हैं।
नए नियमों की प्रभावशीलता
नया नियम कब से लागू?
न्यायमूर्ति अनूप जयराम भंभानी की पीठ ने निर्देश दिया कि शिक्षा विभाग को प्रस्तुत विवरणों में संबंधित विद्यालयों द्वारा प्रस्तावित शुल्क वृद्धि केवल 2027 के शैक्षणिक सत्र से प्रभावी होगी। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी विद्यालय को पिछले शैक्षणिक सत्रों के लिए पूर्वव्यापी रूप से शुल्क या अन्य शुल्कों की मांग करने की अनुमति नहीं होगी।
शिक्षा विभाग की सीमाएँ
व्यापक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं
कोर्ट ने कहा कि निजी गैर-सरकारी मान्यता प्राप्त स्कूलों में शुल्क निर्धारण पर शिक्षा विभाग की नियामक शक्तियां सीमित हैं और व्यापक हस्तक्षेप की अनुमति नहीं देती हैं। कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी स्कूल के खातों में अधिशेष धनराशि की मौजूदगी मात्र से शिक्षा विभाग यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकता कि स्कूल व्यवसायीकरण में लिप्त है।
फीस वृद्धि के लिए नियम
इन धाराओं के तहत फैसला
कोर्ट ने कहा कि दिल्ली विद्यालय शिक्षा अधिनियम, 1973 की धारा 17(3) के तहत, किसी निजी, गैर-सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त विद्यालय को शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में शुल्क बढ़ाने के लिए किसी पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं है। विद्यालय का एकमात्र वैधानिक दायित्व यह है कि उसे शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ से पहले शिक्षा विभाग के पास प्रस्तावित शुल्क का विवरण दाखिल करना होगा।
स्कूलों की मनमानी पर कार्रवाई
अगर स्कूलों ने की मनमानी तो क्या होगा?
अदालत ने कहा कि यदि कोई विद्यालय चल रहे शैक्षणिक सत्र के दौरान शुल्क वृद्धि का प्रस्ताव करता है, तो उसे संशोधित शुल्क लागू होने की तिथि से कम से कम दो महीने पहले शिक्षा विभाग को अपना प्रस्ताव प्रस्तुत करना होगा। शिक्षा विभाग को ऐसे प्रस्ताव पर उसी दो महीने की अवधि के भीतर निर्णय लेना होगा, अन्यथा प्रस्ताव को स्वीकृत मान लिया जाएगा।
मामले का सारांश
क्या था मामला?
कोर्ट ने 137 निजी, गैर-सहायता प्राप्त, मान्यता प्राप्त विद्यालयों द्वारा शिक्षा विभाग द्वारा वर्ष 2016-2017 से 2022-23 के शैक्षणिक वर्षों के लिए समय-समय पर शुल्क वृद्धि के उनके प्रस्तावों को अस्वीकार करने के खिलाफ दायर याचिका पर फैसला सुनाया। स्कूलों ने तर्क दिया कि वे संविधान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत पर्याप्त स्वायत्तता के साथ कार्य करने के हकदार हैं।
अंत में, अदालत ने शिक्षा विभाग के अस्वीकृति आदेश को रद्द कर दिया, यह मानते हुए कि निर्णय एक 'गलत सोच वाली प्रक्रिया' से उत्पन्न हुए थे और इसलिए दोषपूर्ण थे।