निवेशकों के लिए म्यूचुअल फंड में डायरेक्ट प्लान से बढ़ेगा रिटर्न
डायरेक्ट प्लान में बदलाव से निवेशकों को मिलेगा लाभ
मुंबई - एसेट मैनेजमेंट कंपनियों (एएमसी) के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर म्यूचुअल फंड स्कीमों में एक नवंबर से डायरेक्ट प्लान को डिफॉल्ट विकल्प के रूप में लागू किया जाएगा। यह जानकारी भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) के चेयरमैन तुहिन कांत पांडे ने साझा की।
उन्होंने बताया कि एएमसी को उन ग्राहकों को अधिक खर्च अनुपात की जानकारी प्रदान करनी होगी, जो नियमित योजना का चयन करते हैं। सेबी का उद्देश्य म्यूचुअल निवेशकों के रिटर्न को बढ़ाना है। आमतौर पर, डायरेक्ट प्लान में नियमित योजना की तुलना में खर्च अनुपात कम होता है, जिससे निवेशकों को अधिक लाभ मिलता है।
पांडे ने एनडीटीवी प्रॉफिट इग्नाइट: दीपावली संस्करण में कहा कि नियामक आईपीओ और फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) के ढांचे की समीक्षा करेगा। इसके साथ ही, वह एसएमई आईपीओ ढांचे और 'इनोवेटर्स ग्रोथ प्लेटफॉर्म' की भी जांच कर रहा है, खासकर नई पीढ़ी की कंपनियों के लिए, ताकि विकासशील व्यवसायों को सार्वजनिक पूंजी तक बेहतर पहुंच मिल सके।
उन्होंने कहा, "सार्वजनिक पूंजी के साथ सार्वजनिक जिम्मेदारी भी आती है।" पांडे ने यह भी बताया कि सेबी ने इश्यू से जुटाई गई राशि के उपयोग पर सख्त निगरानी रखने का प्रस्ताव रखा है और डिबेंचर ट्रस्टियों के लिए बने ढांचे की भी समीक्षा कर रहा है।
नियामक एक ऐसा ढांचा विकसित कर रहा है, जिसके तहत थर्ड-पार्टी निगरानी एजेंसियां यह सुनिश्चित करेंगी कि आईपीओ के जरिए जुटाई गई राशि का उपयोग उन उद्देश्यों के लिए किया जा रहा है, जो ऑफर दस्तावेजों में उल्लेखित हैं।
यह टिप्पणी तब आई है जब सेबी ने इस महीने की शुरुआत में आईपीओ से जुटाई गई राशि की निगरानी को मजबूत करने के लिए एक कंसल्टेशन पेपर जारी किया है। इस प्रस्ताव में सुझाव दिया गया है कि 'ऑफर-फॉर-सेल' (ओएफएस) को छोड़कर, सभी सार्वजनिक इश्यू के लिए निगरानी एजेंसी रखना अनिवार्य होगा। यदि कोई कंपनी निगरानी एजेंसी के साथ सहयोग नहीं करती है, तो स्टॉक एक्सचेंज उसे हर मामले में 50,000 रुपए का जुर्माना लगा सकता है।
यदि कोई कंपनी सहयोग न करने की रिपोर्ट दर्ज करती है, तो वह तब तक एजेंसी के साथ अपना करार समाप्त नहीं कर सकती या किसी अन्य एजेंसी को नियुक्त नहीं कर सकती, जब तक कि वह अपनी गलती को सुधार न ले। ये प्रस्ताव अभी कंसल्टेशन चरण में हैं और इन्हें नियमों के रूप में लागू नहीं किया गया है। वर्तमान में, यदि आईपीओ में 'फ्रेश इश्यू' का आकार 100 करोड़ रुपए से अधिक है, तो उससे जुटाई गई राशि की निगरानी सेबी में रजिस्टर्ड क्रेडिट रेटिंग एजेंसी द्वारा की जानी चाहिए।