नेपाल में बाढ़: जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मुआवजे की मांग
नेपाल में प्राकृतिक आपदा का संकट
नेपाल, जो हिमालयी क्षेत्र में स्थित है, इस समय एक गंभीर प्राकृतिक आपदा का सामना कर रहा है। बाढ़ और ग्लेशियरों से उत्पन्न विनाशकारी सैलाब ने सैकड़ों लोगों की जान ले ली है, हजारों लोग लापता हैं, और सड़कें, पुल, बस्तियाँ तथा जलविद्युत परियोजनाएँ बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। इस संकट के बीच, नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु परिवर्तन के लिए मुआवजे और 'क्लाइमेट जस्टिस' की मांग उठाई है।
नेपाल की जलवायु परिवर्तन पर स्थिति
नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा है कि उनका देश वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बहुत कम योगदान देता है, फिर भी वह जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर प्रभावों का सामना कर रहा है। उन्होंने बताया कि तेजी से पिघलते ग्लेशियर और विनाशकारी आपदाएँ वैश्विक जलवायु परिवर्तन का परिणाम हैं। खनाल ने यह भी कहा कि नेपाल को मिलने वाली सहायता को 'दान' नहीं, बल्कि 'नैतिक जिम्मेदारी' के रूप में देखा जाना चाहिए।
बड़े उत्सर्जक देशों की जिम्मेदारी
नेपाल के विदेश मंत्री ने चीन, भारत और अमेरिका का नाम लेते हुए कहा कि ये देश बड़े ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जक हैं और उन्हें नेपाल जैसे संवेदनशील देशों को क्षतिपूर्ति देनी चाहिए। 2025 की वैश्विक उत्सर्जन रिपोर्ट के अनुसार, चीन, अमेरिका, भारत, यूरोपीय संघ, रूस और इंडोनेशिया प्रमुख उत्सर्जक बने रहेंगे। भारत ने हमेशा 'क्लाइमेट इक्विटी' का समर्थन किया है और कहा है कि केवल वर्तमान उत्सर्जन के आधार पर जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
आपदा का प्रभाव और बचाव कार्य
यह आपदा 26 अगस्त को नेपाल-चीन सीमा के निकट भोटेकोशी नदी क्षेत्र में शुरू हुई। एक ऊँचे ग्लेशियर के टूटने से बर्फ, चट्टान, मिट्टी और मलबे का सैलाब नीचे की ओर बढ़ गया, जिससे कई जिलों में भारी तबाही हुई। रासुवा, नुवाकोट, धादिंग, चितवन, गोरखा और नवलपरासी जैसे क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुए हैं।
बचाव कार्य में भारत और चीन की भूमिका
भारत ने राहत कार्यों को तेज करते हुए सहायता भेजी है, जिसमें 163 भारतीय नागरिकों को बचाने की सूचना है। नेपाल में लगभग 900 कर्मचारी लापता हैं, और नेपाल सेना के साथ भारत और चीन के विशेष बचाव दल उच्च जोखिम वाले अभियानों में जुटे हैं।
काठमांडू में स्थिति
काठमांडू में, पहचान न हो पाने वाले शवों को अस्थायी कब्रों में दफनाया जा रहा है। प्रशासन डीएनए नमूने और अन्य पहचान संबंधी साक्ष्य सुरक्षित रख रहा है। कई परिवार अपने लापता प्रियजनों की तलाश में अस्पतालों और मुर्दाघरों के चक्कर काट रहे हैं।
जलवायु परिवर्तन का बड़ा सवाल
नेपाल की यह त्रासदी अब केवल एक प्राकृतिक आपदा नहीं रह गई है। यह हिमालय की बदलती जलवायु और वैश्विक जिम्मेदारी पर एक बड़ा सवाल बनकर उभरी है। नेपाल का मुआवजे का दावा जलवायु न्याय की बहस को और जटिल बना रहा है। फिलहाल, प्राथमिकता जिंदगियाँ बचाना और लापता लोगों को ढूंढना है।