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नेपाल में बाढ़ से प्रभावित परिवारों की कठिनाइयाँ और अंतिम संस्कार की रस्में

नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद लापता लोगों के परिवारों की स्थिति अत्यंत कठिन हो गई है। आठ दिन बीत जाने के बाद भी कई परिवारों को अपने प्रियजनों का कोई सुराग नहीं मिला है। इस त्रासदी ने न केवल जीवन को प्रभावित किया है, बल्कि परिवारों को अपने घर और जमा-पूंजी भी खोने पर मजबूर कर दिया है। अंतिम संस्कार की रस्में निभाने में भी उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। जानें इस संकट के बारे में और कैसे लोग प्रतीकात्मक पुतलों के माध्यम से अपने लापता परिजनों को याद कर रहे हैं।
 

नेपाल में बाढ़ का कहर


नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के आठ दिन बीत जाने के बाद भी लापता लोगों का कोई सुराग नहीं मिल पाया है, जिससे उनके परिवार अब उम्मीद छोड़ने लगे हैं। लापता व्यक्तियों के शवों का न मिलना परिजनों को कुश घास से बने प्रतीकात्मक पुतलों के माध्यम से अंतिम संस्कार की रस्में निभाने के लिए मजबूर कर रहा है।


इस त्रासदी ने कई परिवारों को न केवल अपने प्रियजनों से वंचित किया है, बल्कि उनके घर और जीवनभर की जमा-पूंजी भी बहा दी है। अब उनके पास शोक मनाने के लिए भी कोई छत नहीं बची है।


भोटेकोशी नदी में 26 अगस्त को आई बाढ़ ने घर, सड़कें और पुल सब कुछ बहा दिया। इस आपदा में सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों लोग लापता हो गए। त्रिशूली नदी के किनारे बसे कई गांव पूरी तरह से तबाह हो गए हैं।


एक समाचार पोर्टल के अनुसार, रसुवा जिले के पाहारेबेसी गांव में लोग अपने लापता परिजनों के लिए अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे हैं।


हालांकि, इन परिवारों के लिए शोक की रस्में निभाना भी आसान नहीं है। कई परिवारों के घर बाढ़ में बह गए हैं, और अंतिम संस्कार कराने वाले पुजारियों की भी कमी है।


उत्तरगया ग्रामीण नगरपालिका के अध्यक्ष ने बताया कि जिन परिवारों को अब लगता है कि उनके लापता परिजन शायद कभी नहीं मिलेंगे, उन्होंने अंतिम संस्कार की प्रक्रिया शुरू कर दी है।


उपाध्यक्ष ने कहा कि पुरानी बस्ती में लगभग कुछ भी नहीं बचा है, जिससे शोक की रस्में निभाने के दौरान सभी का एक साथ रहना संभव नहीं हो पा रहा है।


रिपोर्ट के अनुसार, पाहारेबेसी के 20 से अधिक परिवार शोक की अवधि पूरी करने के लिए काठमांडू और अन्य स्थानों के लिए रवाना हो चुके हैं।


एक अन्य समाचार स्रोत के अनुसार, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में उन परिजनों के लिए कुश घास से प्रतीकात्मक पुतले बनाए जा रहे हैं, जिनका अब तक कोई पता नहीं चल पाया है।


इस बीच, काठमांडू में शोक की रस्में निभाने वाले परिवारों के लिए बनाए गए कई सार्वजनिक आश्रय पहले से ही भर चुके हैं।


तारकेश्वर स्थित रुद्रमती महादेव मंदिर के किरियापुत्री भवन में आठ समूह ठहरे हुए हैं, जिनमें से प्रत्येक परिवार ने रसुवा की बाढ़ में अपने तीन से पांच परिजनों को खोया है।


गुप्तेश्वर महादेव मंदिर के किरियापुत्री भवन के सभी कमरे भी भरे हुए हैं। जगह की कमी को देखते हुए प्रबंधन ने वहां तंबू लगाए हैं।


किरियापुत्री भवन एक विशेष आश्रय स्थल है, जहां हिंदू परिवार किसी परिजन की मृत्यु के बाद अनिवार्य 13 दिनों की शोक और क्रिया संबंधी रस्में पूरी करने के लिए ठहरते हैं।


इस भवन की प्रबंधन समिति के सदस्य ने कहा कि फिलहाल कोई कमरा खाली नहीं है। मौजूदा परिवारों की शोक अवधि पूरी होने तक नए लोगों के लिए जगह उपलब्ध नहीं होगी।


समस्या केवल रहने की जगह तक सीमित नहीं है। शोक की अवधि के दौरान खाना पकाने के लिए जरूरी रसोई गैस हासिल करना भी परिवारों के लिए मुश्किल हो गया है।


कुछ परिवार शव मिलने और अंतिम संस्कार करने के बाद भी काठमांडू जाने को मजबूर हुए हैं, क्योंकि उनके गांवों में अब उनके घर ही नहीं बचे हैं।


परिवारों ने बताया कि वे प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार का सहारा इसलिए ले रहे हैं क्योंकि सभी लापता लोगों के शव मिलने की उम्मीद बहुत कम रह गई है।


कुछ पीड़ित परिवारों ने यह आरोप भी लगाया है कि शवों को जल्दबाजी में सामूहिक कब्रों में दफनाया जा रहा है।


इस बाढ़ में 7,000 से अधिक घर बह गए, जबकि कई बचे हुए मकान भी रहने लायक नहीं रह गए हैं।


बृहस्पतिवार सुबह तक इस आपदा में मारे गए 1,200 से अधिक लोगों के शव बरामद किए जा चुके थे, जबकि हजारों लोग अब भी लापता हैं।


इस आपदा ने परिवारों से सिर्फ उनके प्रियजन ही नहीं छीने हैं, बल्कि उनके घर और वे बुनियादी सुविधाएं भी छीन ली हैं, जिनके सहारे वे अपने परिजनों की मौत के बाद शोक और अंतिम संस्कार की सदियों पुरानी परंपराएं निभा सकें।