नॉर्वे के सांसद हिमांशु गुलाटी की सुरक्षा पर सवाल
सुरक्षा व्यवस्था पर विचार
38 वर्षीय हिमांशु गुलाटी, जो भारतीय मूल के हैं, नॉर्वे में तीसरी बार सांसद चुने गए हैं और वहाँ के उप-कानून मंत्री भी हैं। उन्हें कोई वीआईपी सुरक्षा नहीं मिली है। उन्होंने बताया कि नॉर्वे की पूर्व प्रधानमंत्री एर्ना सोलबर्ग एक बार उनके घर रात्रिभोज पर आईं और बिना किसी सुरक्षा के खुद कार चलाकर आईं, सीधे रसोई में जाकर रसोइए से बातचीत करने लगीं।
नर्मदा नदी के बरगी बांध में हुए दुखद हादसे के बाद, एक आम नागरिक की सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी ने मुझे सोचने पर मजबूर किया। उनका कहना था कि जब देश में ऊर्जा संकट बढ़ रहा है और अनावश्यक दुर्घटनाओं में लोगों की जान जा रही है, तो वीआईपी सुरक्षा के नाम पर हजारों गाड़ियाँ और सुरक्षा कर्मी क्यों तैनात हैं? यदि यही सुरक्षा कर्मी यातायात, भीड़ नियंत्रण और आपदा प्रबंधन में लगे रहें, तो आम जनता को कितनी राहत मिलेगी?
मेरी मित्र विमला ने सिडनी में एक सिनेमा हॉल में फिल्म देखते समय ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री को बिना सुरक्षा के देखा। अमेरिका और यूरोप में अक्सर वर्तमान और पूर्व राष्ट्राध्यक्षों को बिना सुरक्षा के आम जनता के बीच घूमते देखा जा सकता है। नेपाल के नए प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह ने वीआईपी संस्कृति को समाप्त करने के लिए कई कड़े निर्णय लिए हैं, और उम्मीद है कि वे अपने फैसलों पर कायम रहेंगे।
यहाँ मेरा उद्देश्य भारत के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्रियों की सुरक्षा पर टिप्पणी करना नहीं है। लेकिन देश में लगभग 19,000 लोग हैं जिन्हें सरकारी सुरक्षा दी गई है, जिसमें 66,000 सुरक्षा कर्मी तैनात हैं। अकेले दिल्ली में 500 लोगों को वीआईपी सुरक्षा मिली है, जिस पर सालाना लगभग 750 करोड़ रुपये खर्च होते हैं। सोचिए, बाकी 18,500 लोगों की सुरक्षा पर कितने हजार करोड़ रुपये खर्च होते होंगे? यह पैसा उन मतदाताओं की मेहनत की कमाई पर टैक्स लगाकर वसूला जाता है, जिन्हें नर्मदा या वृंदावन की यमुना में सुरक्षा नियमों की लापरवाही के कारण बार-बार जान गंवानी पड़ती है।
मुझे याद है कि 2003-05 में जब मैं वृंदावन के श्री बांके बिहारी मंदिर का अदालत द्वारा नियुक्त रिसीवर था, तब मैंने वीआईपी गाड़ियों के प्रवेश को रोकने के लिए दो मुख्य रास्तों पर लोहे की चेन लगवाई थी। ऐसा मैंने तब किया जब संकरे मार्ग में मंदिर जाने वाली एक एसडीएम की गाड़ी ने एक वृद्ध महिला को कुचल दिया था।
गली के बाहर मैंने एक बोर्ड भी लगाया था, जिस पर लिखा था, ‘बिहारी जी धनीनाथ या वीआईपीनाथ नहीं हैं - वे दीनबंधु दीनानाथ हैं। उनके द्वार पर दिन बनकर आओगे तभी उनकी कृपा पाओगे।’ मुझे खुशी है कि न सिर्फ केंद्रीय मंत्रियों ने बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ने भी इस नियम का पालन किया।
पिछले कई दशकों से यह स्थिति है कि हर कोई अपने राजनीतिक संपर्कों का लाभ उठाकर सरकारी सुरक्षा ले लेता है और फिर जनता के बीच दबंगई से घूमता है। इनमें से 99 प्रतिशत लोग ऐसे होते हैं जिन्हें कोई खतरा नहीं होता। लेकिन अपनी ताकत और रुतबे का प्रदर्शन करने के लिए उन्हें सरकारी सुरक्षा पाने की लालसा रहती है।
यदि पाठकों को यह आत्मश्लाघा न लगे, तो मैं यह उल्लेख करना चाहूँगा कि 1993-98 के बीच मुझे कई बार जानलेवा हमलों का सामना करना पड़ा। क्योंकि मैंने ‘जैन हवाला कांड’ को उजागर करके देश के सबसे ताकतवर लोगों और आतंकवादियों के खिलाफ अकेले ही युद्ध छेड़ दिया था।
प्रभु कृपा से मैं न तो डरा, न झुका और न बिका। उस समय भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी एन शेषन और मैं देश भर में जनसभाओं को संबोधित करते थे, और अक्सर मुझसे यह प्रश्न पूछा जाता था कि ‘आप इतना ख़तरनाक युद्ध लड़ रहे हैं, आपको डर नहीं लगता?’ मेरा उत्तर होता था, ‘मारे कृष्णा राखे के, राखे कृष्णा मारे के’, जो मुझे नैतिक बल देता था।
इसलिए मुझे आश्चर्य होता है कि बड़े मंचों से धार्मिक प्रवचन करने वाले भी कमांडो और पुलिस के घेरे में रहकर गर्व का अनुभव करते हैं। माया मोह त्यागने का उपदेश देने वालों की कथनी और करनी में इस भेद के कारण ही देश की आध्यात्मिक चेतना का विकास नहीं हो पा रहा है। धर्म भी एक शान-शौकत की चीज बनता जा रहा है।
समय की मांग है कि प्रधानमंत्री मोदी सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ इस विषय पर गंभीरता से विचार करें और एक नीति बनाएं जिसमें केवल राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपालों, मुख्यमंत्रियों और सर्वोच्च व उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों को सुरक्षा मिले, जब तक कि उनके जीवन को गंभीर खतरा न हो। इसके अलावा, उन राजनेताओं को भी अनावश्यक सुरक्षा न दी जाए जो अब किसी पद पर नहीं हैं।
यदि कुछ नेता, उद्योगपति या अन्य लोग सरकारी सुरक्षा के लिए आवेदन करते हैं, तो उन्हें यह सुरक्षा इस शर्त पर दी जाए कि वे इसका खर्च स्वयं वहन करेंगे। कोई सवाल खड़ा कर सकता है कि इन लोगों को सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। लेकिन जो लोग शासन प्रशासन की लापरवाही से दुर्घटनाओं में जान गंवा रहे हैं, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी है?