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पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची विवाद: सुप्रीम कोर्ट का चुनाव आयोग को निर्देश

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण का विवाद सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। अदालत ने चुनाव आयोग को 10 दिनों का समय दिया है ताकि वे नोटिस भेजे गए लोगों की बात सुनकर आवश्यक सुधार कर सकें। ममता बनर्जी की पार्टी इसे अपनी जीत मान रही है, लेकिन बिहार में ऐसी गड़बड़ियों पर कोई विवाद क्यों नहीं हुआ, यह सवाल उठता है। जानें इस मुद्दे की पूरी जानकारी और लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज के बारे में।
 

मतदाता सूची के पुनरीक्षण का विवाद

पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण, जिसे एसआईआर कहा जाता है, का विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है, जहां अदालत ने चुनाव आयोग को 10 दिनों का समय दिया है। अदालत ने कहा है कि चुनाव आयोग को उन सभी लोगों की बात सुननी चाहिए, जिन्हें नोटिस भेजा गया है, और आवश्यक दस्तावेज लेकर सुधार करना चाहिए। ममता बनर्जी की पार्टी इसे अपनी जीत के रूप में देख रही है। लेकिन यह सवाल उठता है कि बिहार में ऐसी गड़बड़ियों के बावजूद विवाद क्यों नहीं हुआ? चुनाव आयोग ने वहां क्यों कोई नोटिस नहीं भेजा?


लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज की परिभाषा

यह समझना आवश्यक है कि लॉजिकल डिस्क्रिपेंसीज क्या होती हैं। यदि किसी नाम की स्पेलिंग गलत है, माता-पिता के नाम में गड़बड़ी है, या पिता और पुत्र की उम्र में 15 साल से कम का अंतर है, तो ऐसे मामलों में सवा करोड़ लोगों को नोटिस भेजा गया है। चुनाव आयोग ने उन लोगों को भी नोटिस भेजा है जिनके पांच से अधिक भाई-बहन हैं। इनमें से कुछ गड़बड़ियां टाइपिंग की हैं, जबकि कुछ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित सिस्टम से उत्पन्न हुई हैं। बिहार में ऐसी गड़बड़ियों की संख्या 93 लाख थी, लेकिन वहां कोई विवाद नहीं हुआ। बंगाल में विवाद अधिक है, जहां नामों में छोटी-छोटी गड़बड़ियां सामने आ रही हैं। ऐसे मामलों में बीएलओ से सुधार कराना चाहिए, न कि किसी मतदाता का नाम काटना उचित है।