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पाकिस्तान में यातना के खिलाफ कानूनी सुरक्षा उपायों पर उठे सवाल

पाकिस्तान में मानवाधिकार आयोग ने प्रधानमंत्री से टॉर्चर-विरोधी ढांचे को मजबूत करने की अपील की है। आयोग ने चेतावनी दी है कि मौजूदा कानूनी ढांचे में कई कमियां हैं, जो पीड़ितों को न्याय दिलाने में बाधा डाल रही हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि डिटेंशन सेंटरों में टॉर्चर और अमानवीय व्यवहार की घटनाएं आम हैं। इसके अलावा, मौजूदा जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए हैं। जानें इस मुद्दे पर और क्या कहा गया है।
 

पाकिस्तान में यातना के खिलाफ कानूनी सुरक्षा उपायों की आलोचना

पाकिस्तान में यातना के खिलाफ कानूनी सुरक्षा उपायों की आलोचना की जा रही है। मानवाधिकार आयोग (HRCP) ने प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ से आग्रह किया है कि वे देश में टॉर्चर-विरोधी ढांचे को मजबूत करें। आयोग ने चेतावनी दी है कि मौजूदा कमियों के कारण पीड़ितों को न्याय प्राप्त करने में बाधाएं आ रही हैं। यह अपील 'यातना के पीड़ितों के समर्थन में अंतर्राष्ट्रीय दिवस' के अवसर पर की गई है।


टॉर्चर और अमानवीय व्यवहार के मामले

'द एक्सप्रेस ट्रिब्यून' के अनुसार, HRCP ने बताया कि पाकिस्तान के विभिन्न डिटेंशन सेंटरों में टॉर्चर और अमानवीय व्यवहार की घटनाएं आम हैं। आयोग ने 'टॉर्चर एंड कस्टोडियल डेथ (प्रिवेंशन एंड पनिशमेंट) एक्ट, 2022' के लागू होने को स्वीकार किया, लेकिन यह भी कहा कि यह कानून मानसिक पीड़ा को टॉर्चर के रूप में सही तरीके से नहीं मानता, जिससे कई प्रकार के दुर्व्यवहार कानून के दायरे से बाहर रह जाते हैं।


कानूनी परिभाषा में कमी

HRCP ने बताया कि जान से मारने की धमकी, डराना-धमकाना, ज़बरदस्ती करना, और लंबे समय तक अकेले कैद में रखना जैसी गतिविधियाँ मौजूदा कानूनी परिभाषा में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं हैं। आयोग ने चेतावनी दी कि इस कमी के कारण पीड़ितों की सुरक्षा कमजोर होती है और गंभीर दुर्व्यवहार के मामलों में दोषियों पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।


जांच प्रक्रिया पर सवाल

HRCP ने मौजूदा जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए हैं। आयोग ने कहा कि टॉर्चर की शिकायतों की जांच का अधिकार फ़ेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) के पास है, जबकि इसके कई सीनियर अधिकारियों का बैकग्राउंड पुलिसिंग का रहा है। इस व्यवस्था से हितों के टकराव की चिंताएं उत्पन्न होती हैं और निष्पक्ष जांच पर भरोसा कम होता है।