पूर्व सिविल सेवकों का खुला पत्र: चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता का किया गया बचाव
पूर्व अधिकारियों का पत्र
नई दिल्ली - पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल और अन्य सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारियों ने भारत की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता की रक्षा के लिए एक संयुक्त पत्र जारी किया है। इस पत्र में चुनावों में धांधली के आरोपों को बिना सबूत के लगाने पर सवाल उठाया गया है। नागरिकों से अपील की गई है कि वे चुनावी व्यवस्था में स्थापित सुरक्षा उपायों पर भरोसा करें और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का सम्मान करें।
चुनावों की सुरक्षा पर जोर
पत्र में कहा गया है कि चुनावों को 'रिग्ड' बताने के लिए बिना सबूत इस शब्द का बार-बार उपयोग करना लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों के विश्वास को कमजोर करता है। पत्र लिखने वाले अधिकारियों ने अपने करियर में भारत के चुनावों का संचालन किया है और उन्होंने मतदाता सूची तैयार करने, मतदान कर्मियों को प्रशिक्षित करने, और मतगणना की निगरानी जैसे कार्य किए हैं।
भ्रष्टाचार के आरोपों का खंडन
पूर्व अधिकारियों ने कहा कि उनका किसी राजनीतिक दल से कोई संबंध नहीं है और वे चुनावी प्रक्रिया की सुरक्षा को उजागर करना चाहते हैं। उन्होंने अतीत में बूथ कैप्चरिंग और मतपेटियों में अवैध मतदान जैसी घटनाओं का उल्लेख किया। पत्र में यह भी कहा गया कि बिहार में 2025 का विधानसभा चुनाव बिना पुनर्मतदान के संपन्न हुआ, जो राज्य के इतिहास में पहली बार हुआ।
चुनाव आयोग की भूमिका
पत्र में चुनाव आयोग की संरचना का उल्लेख करते हुए कहा गया कि आयोग को बहुसदस्यीय निकाय बनाया गया है ताकि चुनाव से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णय किसी एक व्यक्ति के हाथ में न हों। सुप्रीम कोर्ट ने 1995 में इस व्यवस्था को बरकरार रखा था।
मतदाता सूची का पुनरीक्षण
पूर्व अधिकारियों ने मतदाता सूची के गहन पुनरीक्षण का समर्थन करते हुए कहा कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करने का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया में कुछ असुविधाएं हो सकती हैं, लेकिन इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से नहीं देखना चाहिए।
नागरिकों से अपील
पत्र के अंत में नागरिकों से अपील की गई है कि वे अपनी और अपने परिवार के सदस्यों की मतदाता सूची में प्रविष्टियों की जांच करें। यदि किसी का नाम सूची में नहीं है, तो उन्हें दावा दाखिल करने में मदद करनी चाहिए।
सार्वजनिक आरोपों की जिम्मेदारी
पत्र में कहा गया है कि सवाल करना हर नागरिक का अधिकार है, लेकिन आरोप लगाने वाले को सबूत पेश करने की जिम्मेदारी लेनी चाहिए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में लगाए गए आरोपों की न्यायिक जांच से तुलना नहीं की जा सकती।
लोकतंत्र की सुरक्षा
पत्र में यह भी कहा गया कि लोकतंत्र को ऐसे राजनीतिक विमर्श से नुकसान पहुंचता है, जो बिना पर्याप्त प्रमाण के लोगों के बीच अस्थिरता पैदा करता है।