भारत की अर्थव्यवस्था पर विवाद: विकास दर के आंकड़ों में असमानता
मोदी सरकार के विकास दर के आंकड़े पर उठे सवाल
मोदी सरकार की प्रतिष्ठा पर सवाल उठते रहते हैं, खासकर जब वह आर्थिक आंकड़े प्रस्तुत करती है। 31 अगस्त को, सरकार ने चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही के आर्थिक विकास के आंकड़े जारी किए, जिसमें विकास दर 7.8 प्रतिशत बताई गई। यह आंकड़ा तब आया जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बाधाएं थीं। प्रधानमंत्री ने इस उपलब्धि को लेकर एक वीडियो जारी किया और उन लोगों का मजाक उड़ाया जो भारत की अर्थव्यवस्था पर सवाल उठाते हैं।
हालांकि, कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने इस आंकड़े पर सवाल उठाना शुरू कर दिया। कांग्रेस ने कहा कि कृषि क्षेत्र में केवल 3.6 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और माइनिंग क्षेत्र भी पीछे रह गया है। इसके बाद, पूर्व वित्त सचिव सुभाष गर्ग ने दावा किया कि वास्तविक विकास दर केवल 2.6 प्रतिशत है।
गर्ग ने स्पष्ट किया कि पिछले साल की पहली तिमाही में जीडीपी का आंकड़ा 86 लाख करोड़ रुपये था, जिसे बाद में संशोधित कर 80 लाख करोड़ रुपये बताया गया। इस साल की पहली तिमाही में जीडीपी 88 लाख करोड़ रुपये है, जिससे विकास दर 2.6 प्रतिशत बनती है।
सरकार ने कहा कि उसने अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार जीडीपी के आकलन का आधार वर्ष बदला है। पिछले साल के आंकड़े 2011-12 के आधार पर थे, जबकि अब 2021-22 के आधार पर आकलन किया जा रहा है। सरकार का तर्क है कि नए आधार वर्ष के अनुसार पिछले साल की पहली तिमाही का जीडीपी आंकड़ा 80 लाख करोड़ रुपये है।
कांग्रेस के जयराम रमेश ने कहा कि पिछले चार वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था में 43 लाख करोड़ रुपये की कमी आई है। उन्होंने सरकार से पूछा कि भले ही आधार वर्ष बदला जाए, लेकिन अर्थव्यवस्था इतनी पीछे क्यों जा रही है? यदि सरकार का 88 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा सही है, तो पूरे साल का आंकड़ा 352 लाख करोड़ रुपये होगा, जो चार ट्रिलियन डॉलर से कम है।