भारत की एआई शक्ति: वैश्विक मंच पर चुनौती और अवसर
दावोस में भारत की एआई स्थिति
इस साल जनवरी में, दावोस में विश्व आर्थिक मंच के दौरान, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की प्रमुख क्रिस्टालिना जॉर्जीवा ने भारत को 'टियर-2 एआई पावर' के रूप में वर्गीकृत किया। इस चर्चा में यूरेशिया ग्रुप के अध्यक्ष इयान ब्रेमर, माइक्रोसॉफ्ट के अध्यक्ष ब्रैड स्मिथ और सऊदी अरब के निवेश मंत्री खालिद अल-फालिह भी शामिल थे। इस बयान पर भारत के आईटी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने तुरंत प्रतिक्रिया दी, यह कहते हुए कि भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। उन्होंने जीपीयू की संख्या, स्किलिंग कार्यक्रम और डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचे का उल्लेख किया, जिससे भारत में तालियां गूंज उठीं।
हालांकि, एक महीने बाद, वैश्विक मीडिया ने भारत के एआई शिखर सम्मेलन पर सवाल उठाए। क्या यह सम्मेलन वास्तव में प्रभावी था या केवल एक दिखावा? पिछले सप्ताह मैंने इस कॉलम में लिखा था कि भारत एआई का एक बड़ा बाजार बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली से यह घोषणा की कि भारत एआई में विश्व गुरु बनने की दिशा में अग्रसर है।
वैश्विक पत्रिका 'द इकॉनोमिस्ट' की हालिया रिपोर्ट में भारत की एआई योजनाओं की कमियों का उल्लेख किया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत उन्नत मॉडल विकसित करने की दौड़ में केवल एक दर्शक है। दावोस में हुई चर्चा का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में कहा गया कि आईएमएफ की प्रमुख ने भारत को एआई क्षेत्र में दूसरे दर्जे की शक्ति बताया।
दिल्ली में आयोजित सम्मेलन में भी इसी तरह की बातें हुईं। भारत ने ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया और फ्रांस के बाद वार्षिक एआई शिखर सम्मेलन की मेज़बानी करने वाला पहला विकासशील देश बनने का गौरव प्राप्त किया। लेकिन सम्मेलन का स्वरूप एक बड़े व्यापार मेले जैसा प्रतीत हुआ। भारत इस मंच का उपयोग अमेरिका और चीन के साथ उभरती एआई महाशक्ति के रूप में खुद को प्रस्तुत करने के लिए कर रहा है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में 90 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं, जो औसतन प्रतिदिन सात घंटे ऑनलाइन रहते हैं। यह सोचने वाली बात है कि जब भारतीय लोग विदेशी ऐप्स और सोशल मीडिया पर समय बिता रहे हैं, तो उनकी वास्तविक उत्पादकता क्या है? इस स्थिति में, भारत वैश्विक एआई कंपनियों के लिए एक बड़ा बाजार बन गया है, जहां से वे डेटा और कमाई के लिए जुटी हैं।