भारत में मतदाता पहचान की चुनौतियाँ: एक जीवित नागरिक को मृत घोषित करने की कहानी
प्रतिभा बनाम भीड़ बल
समाज की प्रगति प्रतिभा पर निर्भर करती है, न कि भीड़ पर। लेकिन हमारे नेता अपने स्वार्थ के लिए इसे उलट रहे हैं, जिससे समाज को दीर्घकालिक नुकसान हो रहा है। यह स्थिति हर क्षेत्र में बढ़ती जा रही है। नेताओं का इस पर चुप रहना यह दर्शाता है कि स्वदेशी शासन में कुछ गड़बड़ है। पिछले जनवरी से, जाति-आधारित यूजीसी निर्देशों के विरोध में कुछ लोग आरक्षण की समीक्षा की मांग कर रहे हैं।
कमता प्रसाद की कहानी
दिल्ली में तिरपन वर्षीय कमता प्रसाद दर्जी, जो पिछले 35 वर्षों से मतदान कर रहा है, अब 2026 में मतदाता सूची के पुनरीक्षण में मृत घोषित कर दिया गया है। वह सरकारी दफ्तरों के चक्कर काट रहा है, यह साबित करने के लिए कि वह जीवित है। उसकी रोज़ की मेहनत से कमाई गई ढाई सौ रुपए की मजदूरी उसके चार सदस्यीय परिवार का खर्च चलाने में जाती है। अधिकारियों का कहना है कि उसका नाम वापस जुड़ जाएगा, लेकिन कब?
सरकारी दस्तावेजों में मृत घोषित होना
भारत में जीवित व्यक्ति को सरकारी रिकॉर्ड में मृत घोषित करने की यह कहानी नई नहीं है। 1975 में उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में लाल बिहारी को उसके चाचा ने एक अधिकारी को रिश्वत देकर मृत घोषित करवा दिया था। उसे अपने जीवित होने का प्रमाण पाने में उन्नीस वर्ष लगे। उसने अपने नाम के साथ 'मृतक' जोड़ लिया और ऐसे लोगों का संगठन बनाया जिन्हें सरकारी रिकॉर्ड ने जीवित रहते हुए भी मृत घोषित कर दिया।
भरोसे का संकट
आज वही सवाल करोड़ों मतदाताओं के सामने है। गलती से या जानबूझकर, नागरिक को अपने जीवित होने का प्रमाण देना पड़ रहा है। भारतीय गणतंत्र की शुरुआत विश्वास पर हुई थी। 1951 में पहले मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने 17 करोड़ 30 लाख मतदाताओं का चुनाव कराने की चुनौती का सामना किया। उस समय अधिकांश मतदाता निरक्षर थे, लेकिन चुनाव प्रणाली पर भरोसा था।
संविधान की सुरक्षा
संविधान निर्माताओं ने चुनाव आयोग की स्वतंत्रता के लिए अनुच्छेद 324 में मुख्य चुनाव आयुक्त को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश जैसी सुरक्षा दी। लेकिन आज सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक नई व्यवस्था बना ली है। मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक समिति बनाई, जिसमें प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश शामिल हैं।
नागरिकों की पहचान का संकट
बिहार में मतदाता सूची के पुनरीक्षण में 65 लाख नाम मसौदा सूची से हटाए गए। आयोग का तर्क है कि वह मृत, दोहरे और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि गलती आयोग करे और उसकी कीमत नागरिक चुकाए, यह कैसी व्यवस्था है? दिल्ली में कमल लाल को स्थानांतरित बताया गया, जबकि वह उसी स्थान पर रहता है।
संस्थागत संकट
नरेंद्र मोदी सरकार के बारह वर्षों में संस्थाओं की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते रहे हैं। चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियों में पारदर्शिता की कमी है। 2019 में चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को आचार संहिता संबंधी शिकायतों में क्लीन चिट देने से असहमति जताई।
जनता का अधिकार
यदि नागरिक को अपने अस्तित्व का प्रमाण देने के लिए सरकारी दरवाजों पर खड़ा होना पड़ रहा है, तो गणतंत्र किसके लिए है? जनता को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठानी चाहिए। केवल नारे लगाने से चुनाव आयुक्त नहीं हटेगा।