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रतलाम में MPPSC परीक्षा के दौरान सिख महिला की पगड़ी उतारने की मांग पर विवाद

रतलाम में MPPSC परीक्षा के दौरान एक सिख महिला, गुरलीन कौर, से पगड़ी उतारने की मांग की गई, जिससे विवाद उत्पन्न हुआ। सिख समुदाय ने इस पर विरोध जताया और प्रशासन ने माफी मांगी। जानें इस घटना के पीछे की पूरी कहानी और सिख धर्म में पगड़ी के महत्व के बारे में।
 

रतलाम में MPPSC परीक्षा के दौरान विवाद

रतलाम: रविवार को रतलाम के एक विद्यालय में MPPSC की परीक्षा आयोजित की जा रही थी। इस दौरान, राजस्थान की निवासी गुरलीन कौर, जो अमृतधारी सिख हैं, सुरक्षा जांच के लिए पहुंचीं। महिला स्टाफ ने उनसे दुमाला हटाने का अनुरोध किया। जैसे ही यह जानकारी सिख समुदाय तक पहुंची, लोग नाराज होकर परीक्षा केंद्र के बाहर इकट्ठा हो गए। समुदाय ने इसे धार्मिक भावनाओं का अपमान करार दिया। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे और लंबी बातचीत के बाद उपखंड मजिस्ट्रेट और केंद्र के अधीक्षक ने माफी मांगी। उन्होंने भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने का आश्वासन भी दिया।


पगड़ी उतारने की मांग से उपजा विवाद

गुरलीन कौर परीक्षा में शामिल होने के लिए रतलाम एक दिन पहले आई थीं और रिश्तेदारों के घर ठहरी थीं। जब वे परीक्षा केंद्र पहुंचीं, तो महिला स्टाफ ने सुरक्षा कारणों से उनकी पगड़ी उतारने को कहा। गुरलीन ने मना किया, लेकिन विवाद बढ़ गया। जैसे ही सिख समुदाय के लोग इस घटना के बारे में जान गए, बड़ी संख्या में लोग केंद्र के बाहर इकट्ठा हो गए और विरोध जताया।


प्रशासन ने मांगी सार्वजनिक माफी

घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर पहुंचे। सिख समुदाय के प्रतिनिधियों ने संबंधित अधिकारियों से माफी की मांग की। काफी देर तक बातचीत के बाद उपखंड मजिस्ट्रेट प्रतीक सोनकर और केंद्र के अधीक्षक सुभाष कुमावत ने समुदाय के सामने खेद व्यक्त किया। उन्होंने घटना के लिए माफी मांगी और भविष्य में ऐसी घटनाओं से बचने का वादा किया। इसके बाद स्थिति सामान्य हो गई।


गुरलीन कौर का परिचय

गुरलीन कौर चित्तौड़गढ़, राजस्थान की निवासी हैं। वे MPPSC परीक्षा में शामिल होने के लिए रतलाम आई थीं। अमृतधारी होने के नाते, वे सिख धर्म की सभी परंपराओं का पालन करती हैं। घटना के बाद उन्होंने शांति से अपनी बात रखी और प्रशासन ने मामले को सुलझाने में तत्परता दिखाई, जिससे स्थिति नियंत्रण में आई।


सिख धर्म में पगड़ी का महत्व

सिख धर्म में पगड़ी सिर ढकने का साधन नहीं, बल्कि आस्था, सम्मान और पहचान का प्रतीक है। गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना के समय केश रखने का नियम निर्धारित किया था। अमृतधारी सिखों के लिए पगड़ी उतारना धार्मिक मर्यादा के खिलाफ माना जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक प्रतीकों की सुरक्षा की जाती है।