×

विदेश में नौकरी के झांसे में फंसे भारतीय युवाओं की दुर्दशा

विदेश में नौकरी के झांसे में फंसे भारतीय युवाओं की दुर्दशा एक गंभीर मुद्दा बन चुकी है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर टिप्पणी करते हुए मानव तस्करी के मामलों की गंभीरता को उजागर किया है। कई युवा आकर्षक वेतन और करियर के वादे में फंसकर मुश्किलों में पड़ जाते हैं। क्या केंद्र और राज्य सरकारें इस समस्या पर ध्यान देंगी? जानें इस मुद्दे की गहराई में जाकर।
 

मानव तस्करी का गंभीर मुद्दा

विदेश में आकर्षक वेतन और उज्ज्वल करियर का वादा करके बड़ी रकम वसूलने वाले कई गिरोह सक्रिय हैं, जो युवाओं को बाहर ले जाकर उन्हें मुश्किल में छोड़ देते हैं। केंद्र और राज्य सरकारें इस गंभीर अपराध पर चुप क्यों हैं?


सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा है कि कई भारतीयों को नौकरी या शिक्षा के लालच में रूस भेजने के बाद यूक्रेन युद्ध में झोंक देना मानव तस्करी की श्रेणी में आता है। इस संदर्भ में रूस में फंसे 26 व्यक्तियों द्वारा दायर याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार करते हुए, तीन जजों की खंडपीठ ने केंद्र से इस मामले में रिपोर्ट मांगी है। याचिका में उल्लेख किया गया है कि ये लोग अपनी इच्छा के खिलाफ एक अन्य देश की लड़ाई में शामिल हैं, जिसमें उनकी जान भी जा सकती है। यह मामला काफी पुराना हो चुका है। केंद्र ने कई बार उन्हें वापस लाने का आश्वासन दिया, लेकिन वास्तविकता में कुछ नहीं हुआ।


यह भारत की स्थिति की एक दुखद मिसाल है। दुर्भाग्य से, ऐसी घटनाओं की कोई कमी नहीं है। हाल ही में खबरें आई थीं कि भारतीय युवाओं को आईटी या कॉल सेंटर की नौकरी का झांसा देकर दक्षिण-पूर्व एशिया (विशेषकर म्यांमार, कंबोडिया, लाओस) ले जाया गया और उन्हें ऑनलाइन साइबर अपराध करने के लिए मजबूर किया गया। इन मामलों में युवाओं के पासपोर्ट छीन लिए जाते हैं और उन्हें कैद जैसी स्थिति में रखा जाता है। खाड़ी देशों में भी ऐसी घटनाएं अक्सर होती रही हैं।


पिछले वर्ष हरियाणा में ऐसी 33 शिकायतें दर्ज की गईं। सर्वोच्च न्यायालय की हालिया परिभाषा के अनुसार, ये सभी मामले मानव तस्करी के दायरे में आते हैं, जो एक गंभीर अपराध है। सवाल यह है कि केंद्र और राज्य सरकारें इस प्रकार के अपराधों पर चुप क्यों हैं? उन्हें अपने युवाओं की चिंता क्यों नहीं है, जो देश में अवसरों की कमी के कारण विदेशों में रोजगार की तलाश में मानव तस्करों के हाथों में फंस जाते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने अब उचित हस्तक्षेप किया है, लेकिन इससे स्थिति में बदलाव की उम्मीद बहुत कम है।