संसद में यूपीआई भुगतान पर नए शुल्क का विवाद
नई दिल्ली में वित्त समिति की बैठक
नई दिल्ली में, 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक यूपीआई लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत का मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) लगाने का मुद्दा बुधवार को संसद की वित्त संबंधी स्थायी समिति की बैठक में चर्चा का विषय बना। विपक्षी सदस्यों ने इस नई व्यवस्था को 'जनविरोधी' करार दिया।
इस नई व्यवस्था के अनुसार, 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक यूपीआई लेनदेन पर व्यापारी से 0.4 प्रतिशत एमडीआर लिया जाएगा। 75,000 रुपये या उससे अधिक के लेनदेन पर अधिकतम शुल्क 300 रुपये निर्धारित किया गया है। यह व्यवस्था 15 अक्टूबर, 2026 से लागू होगी।
समिति के अध्यक्ष और भाजपा सांसद भर्तृहरि महताब ने बैठक के बाद बताया कि यूपीआई का मुद्दा बैठक के एजेंडे में नहीं था, लेकिन सदस्यों ने अपनी चिंताएं व्यक्त कीं। उन्होंने कहा कि अक्टूबर में नई समिति के गठन के बाद इस विषय पर और चर्चा की जा सकती है।
समिति के सदस्य और आरएसपी सांसद एन.के. प्रेमचंद्रन ने कहा कि 2,000 रुपये से अधिक के व्यापारिक भुगतान पर शुल्क लगाने का निर्णय व्यापक प्रभाव डालेगा और इसे 'पूरी तरह जनविरोधी' बताया।
कांग्रेस सांसद मनीष तिवारी ने कहा कि संसदीय समितियों की कार्यवाही पर टिप्पणी करना उचित नहीं है, लेकिन यूपीआई लेनदेन पर शुल्क लगाने की आशंका से देशभर में चिंता और नाराजगी है। उन्होंने कहा कि ऐसे मुद्दों का प्रभाव संसदीय कार्यवाही में भी दिखाई देना स्वाभाविक है।
सरकार ने मंगलवार को बड़े डिजिटल भुगतान के लिए नई व्यवस्था की घोषणा की थी, जिससे जनवरी 2020 से लागू शून्य-एमडीआर नीति में बदलाव होगा। शून्य-एमडीआर नीति का उद्देश्य डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देना था। हालांकि, बैंक और फिनटेक कंपनियां लंबे समय से यूपीआई व्यवस्था की लागत और उसके वित्तपोषण के मुद्दे को उठाती रही हैं।
नई व्यवस्था में शुल्क व्यापारी पर लागू होगा, ग्राहक पर नहीं। 2,000 रुपये तक के यूपीआई व्यापारिक भुगतान शुल्क-मुक्त रहेंगे। बैठक में जीडीपी की गणना के मुद्दे पर भी चर्चा हुई। वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में देश की जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत रही है। मनीष तिवारी ने सरकार से जीडीपी की गणना की पद्धति स्पष्ट करने की मांग की, क्योंकि आधार वर्ष में बदलाव किया गया है।