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सुप्रीम कोर्ट में प्रेस की आजादी और प्राइवेसी के बीच टकराव पर सुनवाई

डिजिटल समाचार प्रकाशक संघ ने सुप्रीम कोर्ट में DPDP अधिनियम के खिलाफ याचिका दायर की है, जिसमें पत्रकारिता के लिए छूट की कमी और गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा पर चिंता जताई गई है। इस मामले में 21 प्रमुख समाचार प्रकाशक शामिल हैं, और सुनवाई 27 अक्टूबर को होगी। DNPA का तर्क है कि नए नियम पत्रकारिता में बाधा डाल सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पत्रकारिता और प्राइवेसी के बीच संतुलन स्थापित करने में महत्वपूर्ण होगा।
 

प्रेस की आजादी का मामला सुप्रीम कोर्ट में

नई दिल्ली। वर्तमान डिजिटल युग में प्राइवेसी और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच का विवाद अब सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच चुका है। 'डिजिटल समाचार प्रकाशक संघ' (DNPA) ने डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 और उससे संबंधित नियमों के कुछ प्रावधानों को चुनौती दी है। संघ का कहना है कि इन प्रावधानों में पत्रकारिता के लिए स्पष्ट छूट का अभाव है, जिससे जांच पत्रकारिता, व्हिसलब्लोअर और पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

इस कानूनी चुनौती में 21 प्रमुख समाचार प्रकाशक शामिल हैं, जिनमें Network18, NDTV, The Indian Express और Times Internet जैसे प्रमुख मीडिया समूह शामिल हैं। याचिका 6 अक्टूबर को दायर की गई थी और इस मामले की सुनवाई 27 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में होने वाली है।

DNPA की मुख्य चिंताएँ

DNPA का कहना है कि DPDP अधिनियम के तहत डेटा का उपयोग करने से पहले नोटिस और सहमति जैसी शर्तें पत्रकारिता के कार्य में बाधा डाल सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि एक पत्रकार किसी व्यक्ति या संस्था की जांच कर रहा है और उसे पहले इसकी जानकारी देकर सहमति लेनी पड़ती है, तो इससे जांच प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, सबूतों को नष्ट करने या गवाहों पर दबाव डालने का खतरा भी बढ़ सकता है।

प्रकाशकों ने डेटा मिटाने से संबंधित अधिकारों पर भी चिंता व्यक्त की है। उनका तर्क है कि इसका उपयोग प्रकाशित समाचारों या जांच से संबंधित जानकारी को हटाने के लिए किया जा सकता है, जिससे सार्वजनिक हित में की जाने वाली रिपोर्टिंग और समाचार अभिलेखों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

गोपनीय स्रोतों की सुरक्षा पर चिंता

सूत्रों के अनुसार, इस याचिका में सरकार द्वारा डेटा की मांग से संबंधित प्रावधानों पर भी सवाल उठाए गए हैं। DNPA का कहना है कि ऐसी शक्तियों के उपयोग से पत्रकारों के गोपनीय स्रोतों की पहचान उजागर होने का खतरा हो सकता है, जिससे भ्रष्टाचार, कॉर्पोरेट गड़बड़ी या अन्य सार्वजनिक हित के मामलों में व्हिसलब्लोअर्स पर असर पड़ सकता है।

चुनौती दिए गए प्रावधान

DNPA ने DPDP अधिनियम की कई धाराओं—Section 7, 17(2), 18, 19, 27, 29, 36, 37 और 44(3)—के साथ DPDP नियम की नियम 16, 17 और 23 को चुनौती दी है। संघ का कहना है कि पत्रकारिता को एक अलग संरक्षित गतिविधि के रूप में पर्याप्त छूट नहीं दी गई है, जो संविधान के Article 14 और Article 19(1)(a) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करती है।

महत्वपूर्ण प्रावधानों की प्रभाविता

DPDP कानून का एक बड़ा हिस्सा चरणबद्ध तरीके से लागू होना है, और कई महत्वपूर्ण प्रावधान मई 2027 से प्रभावी होंगे। इस प्रकार, सुप्रीम कोर्ट का निर्णय यह निर्धारित करने में महत्वपूर्ण हो सकता है कि डेटा प्राइवेसी और नागरिकों के निजता अधिकारों की सुरक्षा के साथ-साथ पत्रकारिता और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने DNPA की दलीलों पर अंतिम निर्णय नहीं दिया है। इसलिए, “प्रेस की आजादी पर हमला” DNPA द्वारा उठाई गई संवैधानिक आपत्ति है, जो न्यायालय का निष्कर्ष नहीं है।