सोशल मीडिया पर गलत सूचनाओं का प्रभाव: एक अध्ययन की समीक्षा
सोशल मीडिया और गलत सूचनाओं का अध्ययन
(मैरियन-आंद्रे रिजोउ, यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी सिडनी) सिडनी, 30 जुलाई - सोशल मीडिया पर जो सामग्री हमें दिखाई देती है, उसमें कितनी जानकारी ऐसी होती है जो बार-बार झूठी जानकारी फैलाने वाले स्रोतों से आती है? यदि ऐसी सामग्री को आपकी फीड से हटा दिया जाए, तो क्या आपकी सोच या मान्यताओं में कोई बदलाव आएगा? इन सवालों का उत्तर खोजने का प्रयास एक नए अध्ययन ने किया है, जो 'साइंस एडवांसेज' में प्रकाशित हुआ है।
यह अध्ययन फेसबुक और इंस्टाग्राम की मूल कंपनी मेटा और विभिन्न विश्वविद्यालयों के शोधकर्ताओं द्वारा 2020 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के दौरान किया गया। इस अध्ययन की विशेषता यह है कि इसे फेसबुक और इंस्टाग्राम के वास्तविक न्यूज फीड पर किया गया। पहले नजर में इसके निष्कर्ष राहत देने वाले प्रतीत होते हैं।
अध्ययन के अनुसार, अधिकांश लोगों तक झूठी सूचनाएं बहुत कम पहुंचीं, और यदि उन्हें फीड से हटा दिया गया, तो लोगों की मान्यताओं में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं आया। लेकिन एक शोधकर्ता के रूप में, मेरा मानना है कि इस अध्ययन के परिणामों से अधिक महत्वपूर्ण वे सीमाएं हैं, जिनके भीतर यह शोध किया गया। असली कहानी इन्हीं बारीकियों में छिपी है।
सोशल मीडिया का प्रभाव मापना सरल नहीं है। किसी व्यक्ति की राजनीतिक सोच केवल सोशल मीडिया से नहीं बनती; टीवी, रेडियो, नेताओं के भाषण, परिवार, मित्रों और सामाजिक माहौल का भी गहरा प्रभाव पड़ता है। ऐसे में यह तय करना मुश्किल है कि सोशल मीडिया का योगदान कितना है।
एक और चुनौती यह है कि लोग अक्सर अपनी पसंद के अनुसार जानकारी चुनते हैं। जो लोग पहले से ही कट्टर विचारों में रुचि रखते हैं, वे वैसी ही सामग्री देखने वाले लोगों के बीच रहना पसंद करते हैं। ऐसे समूह छोटे लेकिन सघन होते हैं।
इसलिए केवल लोगों के व्यवहार को देखकर यह समझना लगभग असंभव है कि सोशल मीडिया वास्तव में उनकी सोच को बदल रहा है या नहीं। इस समस्या का सबसे विश्वसनीय समाधान 'रैंडमाइज्ड' प्रयोग है, जिसमें कुछ लोगों की सोशल मीडिया फीड को नियंत्रित तरीके से बदला जाता है।
इस अध्ययन का महत्व इसी कारण है। कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, बर्कले के शोधकर्ता ओलिवियर बर्जरॉन-बुटिन के नेतृत्व में टीम ने यह जानने की कोशिश की कि अमेरिका में फेसबुक और इंस्टाग्राम उपयोगकर्ताओं की फीड में कितनी सामग्री ऐसे स्रोतों से आती है, जिन्हें बार-बार झूठी जानकारी फैलाने वाला माना गया है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने अमेरिका के 23.1 करोड़ फेसबुक खातों और 20 करोड़ इंस्टाग्राम खातों का विश्लेषण किया।
इन स्रोतों में वे फेसबुक पेज, समूह, इंस्टाग्राम खाते और वेबसाइट्स शामिल थीं, जिन्हें मेटा के स्वतंत्र 'फैक्ट-चेकर' ने कई बार गलत या भ्रामक जानकारी फैलाने का दोषी ठहराया था। परिणाम चौंकाने वाले थे। औसतन एक फेसबुक उपयोगकर्ता की फीड में केवल 1.1 प्रतिशत सामग्री ही ऐसे गैर भरोसेमंद स्रोतों से आती थी।
इंस्टाग्राम पर यह आंकड़ा और भी कम, महज 0.1 प्रतिशत था। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू इससे बिल्कुल अलग था। गलत जानकारी का प्रसार पूरे मंच पर समान रूप से नहीं फैला था, बल्कि यह कुछ चुनिंदा उपयोगकर्ताओं तक बहुत अधिक केंद्रित था।
उदाहरण के लिए, लगभग 5.3 करोड़ फेसबुक उपयोगकर्ता, जो कुल उपयोगकर्ताओं का करीब 23 प्रतिशत थे, उन्हें गैर भरोसेमंद स्रोतों से आने वाली लगभग 80 प्रतिशत सामग्री दिखाई दे रही थी। सबसे ज्यादा प्रभावित 2.5 प्रतिशत उपयोगकर्ताओं के लिए फेसबुक पेज और समूहों से मिलने वाली राजनीतिक और सामाजिक सामग्री का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा इन्हीं गैर भरोसेमंद स्रोतों से आता था।
अमेरिका में 2020 के राष्ट्रपति चुनाव के आसपास तीन महीनों तक शोधकर्ताओं ने लगभग 16 हजार स्वयंसेवी उपयोगकर्ताओं को दो समूहों में बांट दिया। एक समूह की फेसबुक और इंस्टाग्राम फीड से उन सभी स्रोतों की पोस्ट हटा दी गईं, जिन्हें बार-बार झूठी जानकारी फैलाने वाला माना गया था। दूसरे समूह की फीड में कोई बदलाव नहीं किया गया।
इस प्रयोग के बाद जिन उपयोगकर्ताओं की फीड में बदलाव किया गया, वहां ऐसे संदिग्ध स्रोतों से आने वाली सामग्री लगभग 70 प्रतिशत तक कम हो गई। शोधकर्ताओं ने यह जानने के लिए 10 अलग-अलग पहलुओं का आकलन किया कि क्या एल्गोरिद्म में बदलाव का लोगों पर कोई असर पड़ा या नहीं।
नतीजा स्पष्ट था कि लगभग कुछ भी नहीं बदला। यहां तक कि जो लोग सबसे ज्यादा संदिग्ध सामग्री देखते थे, उनकी सोच में भी कोई स्पष्ट बदलाव दर्ज नहीं हुआ। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी माना कि इस छोटे समूह से जुड़े आंकड़े अपेक्षाकृत कम सटीक हैं।
इस अध्ययन की सबसे बड़ी कमजोरी वहीं है, जहां इसके निष्कर्षों और उनकी संभावित व्याख्या के बीच अंतर पैदा होता है। शोध में किसी स्रोत को तभी 'गैर भरोसेमंद' माना गया, जब मेटा के स्वतंत्र फैक्ट-चेकर उसे कम-से-कम दो बार झूठी या भ्रामक जानकारी फैलाते हुए पकड़ चुके थे।
बाद में मेटा के सॉफ्टवेयर ने उन्हीं निष्कर्षों के आधार पर 2020 के दौरान लगभग 18 करोड़ पोस्ट पर चेतावनी का लेबल लगाया। लेकिन समस्या यह है कि जो सामग्री इस जांच प्रक्रिया की पकड़ में ही नहीं आई, उसे स्वतः भरोसेमंद मान लिया गया।
इस अध्ययन में दिखाई नहीं देने वाली भ्रामक सामग्री का प्रभाव फैक्ट-चेकर द्वारा पकड़ी गई सभी गलत सूचनाओं की तुलना में लगभग 46 गुना अधिक हो सकता है।
जब किसी देश के समर्थन से चलाए जाने वाले दुष्प्रचार अभियान सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते हैं, तो वे अक्सर नए-नए खाते बनाते रहते हैं। इस कारण वे फैक्ट-चेकिंग की तय सीमा तक पहुंचने से पहले ही अपना नेटवर्क बदल देते हैं।
अध्ययन की एक और बड़ी कमजोरी यह है कि जिस फेसबुक पर यह प्रयोग किया गया, वह आम दिनों वाला फेसबुक नहीं था। अमेरिका के राष्ट्रपति के 2020 के चुनाव से पहले मेटा ने झूठी सूचनाओं के प्रसार को रोकने के लिए 63 आपातकालीन कदम लागू किए थे।
इन उपायों के कारण सामान्य फेसबुक फीड में गैर भरोसेमंद स्रोतों से आने वाली सामग्री पहले ही लगभग 24 प्रतिशत कम हो चुकी थी।
इसलिए, यह प्रयोग पहले से काफी हद तक 'साफ' किए जा चुके सोशल मीडिया मंच पर किया गया था। किसी व्यक्ति की राजनीतिक और सामाजिक मान्यताएं वर्षों में बनती हैं। ऐसे में कुछ पोस्ट हटाने भर से लोगों की सोच बदल जाने की उम्मीद करना शायद अवास्तविक है।
लेखक को आशंका है कि बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियां इस अध्ययन के निष्कर्षों को अपने पक्ष में पेश कर सकती हैं। उदाहरण के लिए, वे कह सकती हैं कि 'उपयोगकर्ताओं को झूठी जानकारी बहुत कम दिखाई देती है।' या फिर यह तर्क दे सकती हैं कि 'गलत सूचनाओं को हटाने से लोगों की सोच में कोई बदलाव नहीं आता, इसलिए कंटेंट मॉडरेशन की जरूरत ही क्या है?'
लेकिन निष्कर्ष निकालने से पहले यह समझना जरूरी है कि इस शोध का दायरा क्या था। इस शोध ने उन सभी गलत सूचनाओं का अध्ययन नहीं किया जो सोशल मीडिया पर मौजूद थीं। इसमें केवल उन्हीं स्रोतों को शामिल किया गया था, जिन्हें पहले ही बार-बार गलत जानकारी फैलाने वाला घोषित किया जा चुका था।