सोशल मीडिया पर भाजपा की चुनौतियाँ: नए नियम और सवर्ण समर्थकों की नाराजगी
सोशल मीडिया पर नियंत्रण की आवश्यकता
केंद्र सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए सोशल मीडिया पर कंटेंट और उसके नैरेटिव को नियंत्रित करना एक प्रमुख चिंता बन गई है। आईटी कानून 2001 और आईटी नियम 2021 के तहत सरकार पहले से ही कंटेंट पर नियंत्रण रखती है, लेकिन अब इसकी आवश्यकता और भी बढ़ गई है। इसका मुख्य कारण यह है कि भाजपा की सोशल मीडिया पर सुरक्षा की दीवार अब कमजोर हो गई है। यूजीसी द्वारा जारी की गई नियमावली ने भाजपा के सवर्ण समर्थकों में भारी निराशा पैदा की है।
सवर्ण समर्थकों को इस बात से अधिक दुख हुआ है कि जब इस नियमावली का विरोध हुआ और सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया आई, तब भाजपा के नेताओं ने इस पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया। इस स्थिति ने सवर्ण समर्थकों को आहत किया और उन्होंने यूजीसी के खिलाफ अपनी आवाज उठाने का निर्णय लिया।
सोशल मीडिया में भाजपा की स्थिति
पिछले दो महीनों में सोशल मीडिया पर भाजपा के पुराने समर्थक अपनी हिंदुत्व की विचारधारा पर कायम हैं, लेकिन भाजपा और आरएसएस की आलोचना भी कर रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पुराने वीडियो को साझा कर उनके और वर्तमान सरकार के कार्यों के बीच के विरोधाभासों को उजागर किया जा रहा है। संघ प्रमुख के भाषण भी आलोचना के दायरे में आ गए हैं।
भाजपा की सोशल मीडिया पर जो चुनौती सामने आई है, वह इस बात का संकेत है कि उसकी ताकत अब पूरी तरह से उजागर हो गई है। पहले यह माना जाता था कि भाजपा का आईटी सेल सबसे मजबूत है, लेकिन यूजीसी विवाद ने यह दिखा दिया कि भाजपा की छवि उसके कुछ सवर्ण समर्थकों के बल पर बनी थी।
भाजपा की रणनीतियाँ
भाजपा ने पिछले दो महीनों में कोई नया नैरेटिव स्थापित नहीं किया है और न ही विपक्षी दलों के नैरेटिव का जवाब दे पा रही है। भाजपा समर्थक अब प्रधानमंत्री मोदी और संघ प्रमुख मोहन भागवत के साथ-साथ भाजपा आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय को भी ट्रोल कर रहे हैं।
इस स्थिति को सुधारने के लिए एक सीधा उपाय यह था कि यूजीसी की नियमावली को वापस लिया जाए, लेकिन सरकार इसे वापस नहीं ले सकती क्योंकि यह नियमावली बहुत सोच-समझकर बनाई गई है। सरकार को यह दिखाना है कि वह दलितों और पिछड़ों के हितों की रक्षा कर रही है।
नए नियमों का प्रभाव
सरकार ने आईटी नियमों में बड़े बदलाव का मसौदा तैयार किया है, जिसमें यह प्रावधान किया गया है कि सरकार सोशल मीडिया पर डाले जाने वाले कंटेंट को कानूनी रूप से हटवा सकेगी। पहले सरकार केवल दिशानिर्देश जारी करती थी, लेकिन अब उसे कानूनी अधिकार दिया जा रहा है।
इसके अलावा, इंटरमीडियरी कंपनियों को हर कंटेंट के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। यदि सरकार किसी कंटेंट को आपत्तिजनक मानती है, तो उसे हटाना होगा। यह भी प्रावधान किया गया है कि कंपनियों को एक घंटे के भीतर कंटेंट हटाना होगा।
भविष्य की चुनौतियाँ
इसमें एक चिंताजनक प्रस्ताव यह है कि यदि सरकार किसी कंटेंट को हटाने का निर्देश देती है, तो कंपनियाँ उसे कोर्ट में चुनौती नहीं दे सकेंगी। यह स्थिति सोशल मीडिया पर निगरानी को और सख्त बना देगी।
हालांकि, समर्थक से विरोधी बने सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर्स इस बदलाव से परेशान नहीं हैं। उनका मानना है कि चाहे कितने भी मंत्रालयों को कंटेंट हटाने का अधिकार दिया जाए, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। आने वाले दिनों में सोशल मीडिया पर संघर्ष और बढ़ने की संभावना है।