हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार जांच नियमों में किया महत्वपूर्ण बदलाव
भ्रष्टाचार जांच में नए नियमों की शुरुआत
हरियाणा सरकार ने भ्रष्टाचार की जांच से संबंधित नियमों में बदलाव किया है। अब अधिकारियों पर एफआईआर दर्ज करने से पहले सक्षम प्राधिकारी की अनुमति लेना अनिवार्य होगा, जबकि रंगे हाथों पकड़े जाने की स्थिति में कार्रवाई जारी रहेगी।
चंडीगढ़ में नई नीति का ऐलान
चंडीगढ़। हरियाणा सरकार ने राज्य में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की जांच के लिए एक महत्वपूर्ण नीतिगत बदलाव किया है। अब पुलिस या विजिलेंस किसी सरकारी कर्मचारी पर सीधे एफआईआर या जांच शुरू नहीं कर सकेगी। राज्य सरकार ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17A के तहत एक नई और विस्तृत स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) जारी की है। इस निर्णय का सीधा प्रभाव प्रदेश की नौकरशाही और प्रशासनिक कार्यों पर पड़ेगा।
ईमानदार अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने की योजना
कई बार ईमानदार अधिकारियों को झूठी शिकायतों के माध्यम से परेशान किया जाता है, जिससे वे महत्वपूर्ण निर्णय लेने में हिचकिचाते हैं। सरकार का यह नया कदम इस डर को समाप्त करने के लिए है। नए नियमों के अनुसार, किसी भी लोक सेवक द्वारा अपने कर्तव्यों के दौरान लिए गए निर्णयों पर सवाल उठाने से पहले सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति लेना आवश्यक होगा।
रंगे हाथों पकड़े जाने पर कोई छूट नहीं
यह महत्वपूर्ण है कि ये नियम भ्रष्टाचार करने वालों को बचाने के लिए नहीं हैं। नई गाइडलाइंस में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि कोई अधिकारी या कर्मचारी रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों (Trap Case) पकड़ा जाता है, तो उसे धारा 17A का कोई लाभ नहीं मिलेगा। ऐसे मामलों में जांच एजेंसियों को पूर्व अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी और वे तुरंत कानूनी कार्रवाई कर सकेंगी। यह प्रावधान सिस्टम में पारदर्शिता सुनिश्चित करता है।
केंद्र के निर्देशों के अनुसार नई व्यवस्था
हरियाणा सरकार ने यह निर्णय केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (DoPT) के निर्देशों के आधार पर लिया है। 2018 में केंद्र ने भ्रष्टाचार निरोधक कानून में संशोधन किया था। हरियाणा में अब 2022 के पुराने आदेशों को रद्द कर दिया गया है और नई प्रक्रिया को तुरंत लागू किया गया है। यह नियम ग्रुप ए और बी के अधिकारियों के साथ-साथ ग्रुप सी और डी (तृतीय व चतुर्थ श्रेणी) के कर्मचारियों पर भी समान रूप से लागू होगा।
तीन महीने में तय होगा अधिकारी का भविष्य
जांच प्रक्रिया को समयबद्ध बनाने के लिए सरकार ने सख्त टाइमलाइन निर्धारित की है।
जांच एजेंसी को पहले सक्षम प्राधिकारी से अनुमति मांगनी होगी।
सक्षम प्राधिकारी को 3 महीने के भीतर यह तय करना होगा कि जांच की अनुमति दी जाए या नहीं।
यदि मामला जटिल है, तो लिखित कारण बताकर इस समय को एक महीने के लिए बढ़ाया जा सकता है।
इस समय सीमा के निर्धारण से जांच एजेंसियों की फाइलें अब वर्षों तक नहीं लटकेंगी और आरोपी अधिकारी के भविष्य पर भी अनिश्चितता की तलवार नहीं लटकी रहेगी।
मंजूरी देने वाले अधिकारियों की जिम्मेदारी
नई एसओपी में मंजूरी देने वाले अधिकारियों (Competent Authority) की जिम्मेदारी भी स्पष्ट की गई है।
यदि जांच हरियाणा एंटी करप्शन ब्यूरो द्वारा की जा रही है, तो प्रशासनिक अधिकारियों के लिए मुख्य सचिव की मंजूरी आवश्यक होगी।
अन्य विभागों या एजेंसियों द्वारा जांच किए जाने पर संबंधित विभाग के प्रशासनिक सचिव ही सक्षम प्राधिकारी माने जाएंगे।
सभी विभागों में इसके लिए एक 'सिंगल विंडो सिस्टम' बनाने पर जोर दिया गया है ताकि आवेदन इधर-उधर न भटकें।
विशेषज्ञों की राय
प्रशासनिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि इस कदम से निर्णय लेने की प्रक्रिया में तेजी आएगी। जब अधिकारियों को यह विश्वास होगा कि उनके द्वारा नेकनीयती में लिए गए निर्णयों पर उन्हें भविष्य में कानूनी पचड़ों में नहीं फंसाया जाएगा, तो वे जनहित के कार्यों में अधिक सक्रियता दिखा सकेंगे। हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार लंबित मामलों का निपटारा कितनी जल्दी करती है क्योंकि यह नियम उन मामलों पर भी लागू होगा।