हिंदी पत्रकारिता: एक समय की क्रांति का हथियार अब उपेक्षित
हिंदी पत्रकारिता की स्थिति
जितेन्द्र बच्चन
दिल्ली: हिंदी पत्रकारिता ने हमेशा से क्रांतिकारियों का एक महत्वपूर्ण साधन रही है। यह सरकार और जनता के बीच एक मजबूत पुल का काम करती है। वर्तमान में, देश में सबसे अधिक समाचार पत्र और पत्रिकाएं हिंदी में प्रकाशित होती हैं, और न्यूज चैनल भी इसी भाषा में अधिक हैं। हिंदी पत्रकारिता किसान, मजदूर, शिक्षित वर्ग और आम जनता की आवाज को उठाती है। फिर भी, इसकी प्रभावशीलता अब अंग्रेजी मीडिया की तुलना में कम हो गई है। इसका मुख्य कारण सरकारी उपेक्षा है। आज हिंदी पत्रकारिता को अपने ही देश में दोयम दर्जे का माना जा रहा है, और इसकी प्रतिष्ठा लगातार गिरती जा रही है।
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर, हिंदी पत्रकार अन्य भाषाओं की आलोचना करते हैं, लेकिन वही लोग हिंदी पत्रकारों को नौकरी देने में हिचकिचाते हैं। बड़े आयोजन होते हैं, लेकिन शोहरत अंग्रेजी के संपादकों के पास जाती है। अंग्रेजी पत्रकारिता के माध्यम से कई मीडिया हाउस सत्ता के करीब पहुंचकर लाभ उठा रहे हैं, जबकि हिंदी पत्रकारों को सरकारी अधिकारियों से दूर रखा जाता है। सरकारी विज्ञापनों में अक्सर अंग्रेजी के बड़े अखबारों को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे हिंदी और क्षेत्रीय समाचार पत्रों को कम विज्ञापन मिलते हैं। इस उपेक्षा के कारण कई हिंदी पत्रिकाएं बंद हो चुकी हैं या संकट में हैं।
छोटे कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले हिंदी पत्रकारों को नियमित वेतन, स्वास्थ्य बीमा या सरकारी सुरक्षा का लाभ नहीं मिलता। वे अक्सर स्थानीय प्रशासन और माफिया के निशाने पर होते हैं। कई राज्यों में हिंदी पत्रकारों को मान्यता प्राप्त करने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, जिससे उन्हें प्रेस सुविधाओं से वंचित रखा जाता है। सरकारी विभागों से डेटा प्राप्त करने में भी उन्हें उपेक्षा का सामना करना पड़ता है। इस उदासीनता के कारण कई महत्वपूर्ण खबरें मुख्यधारा से गायब हो जाती हैं, और पत्रकारों को प्रायोजित खबरों पर निर्भर होना पड़ता है।
जब किसी बड़े मंच पर पत्रकारों को स्थान दिया जाता है, तो अंग्रेजी पत्रकारों को प्राथमिकता दी जाती है। कई हिंदी पत्रकारों के पास अच्छा ज्ञान है, लेकिन अंग्रेजी में कमजोर होने के कारण उन्हें हेय दृष्टि से देखा जाता है। हिंदी पत्रकारिता को अक्सर दलाल और चापलूस कहा जाता है। यह विडंबना है कि अपने ही देश में हिंदी पत्रकारिता की स्थिति इतनी खराब हो गई है।
हिंदी चैनलों और समाचार पत्रों के माध्यम से कई राजनेता और व्यापारी सफल हुए हैं, लेकिन जब क्रेडिट देने की बात आती है, तो हिंदी पत्रकारों को भुला दिया जाता है। अब हिंदी पत्रकारिता के सामने विश्वसनीयता का संकट भी है। सोशल मीडिया के युग में अफवाहों और फर्जी खबरों की बाढ़ आ गई है। 'सच' पीछे छूट रहा है, और सनसनीखेज खबरों की होड़ में तथ्यों की पुष्टि किए बिना खबरें प्रकाशित की जा रही हैं। यह हिंदी पत्रकारिता के सिद्धांतों को नुकसान पहुंचा रहा है।
अधिकतर मीडिया हाउस ने पत्रकारिता को एक लाभकारी व्यवसाय बना दिया है। टीआरपी और अधिक क्लिक पाने के लिए गंभीर मुद्दों को नजरअंदाज किया जा रहा है। इसके परिणामस्वरूप कई बार खबरें निष्पक्ष नहीं लगतीं। सोशल मीडिया, यूट्यूब और एआई आधारित प्लेटफार्मों ने समाचारों के उपयोग के तरीके को बदल दिया है। वेब पत्रकारिता की भाषा हिंदी के मूल स्वरूप को नष्ट कर रही है। हिंदी पत्रकारिता को नई चुनौतियों का सामना करना होगा, और सरकार को भी इसे महत्व देना होगा। तभी हिंदी पत्रकारिता को वह स्थान मिलेगा, जो इसकी आवश्यकता और अधिकार है।