हिमाचल प्रदेश में एंटी-हेल गनों पर एक साल का प्रतिबंध
हिमाचल HC ने एंटी-हेल गनों पर रोक लगाई
हिमाचल प्रदेश में सेब की फसल को ओलावृष्टि से बचाने के लिए उपयोग की जाने वाली एंटी-हेल गन अब विवादों में आ गई है। हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने शिमला जिले के जुब्बल-कोटखाई क्षेत्र में दो एंटी-हेल गनों के संचालन पर एक साल के लिए रोक लगा दी है। अदालत ने राज्य सरकार को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि निजी तौर पर स्थापित एंटी-हेल गन भी न चलें। यह आदेश 1 अक्टूबर 2026 को जारी किया गया था, जिसकी जानकारी 5 अक्टूबर को मिली। अगली सुनवाई 8 दिसंबर 2026 को होगी।
बागवानों की चिंताएं
इस मामले में शिकायत की गई थी कि एंटी-हेल गन के संचालन से बादल अन्य क्षेत्रों की ओर चले जाते हैं, जिससे वहां तेज बारिश और ओलावृष्टि का खतरा बढ़ सकता है। इससे प्रभावित क्षेत्रों के बागवानों को नुकसान हो सकता है। हाईकोर्ट ने मामले से संबंधित रिपोर्ट और राज्य के बागवानी विभाग द्वारा प्रस्तुत हलफनामे की समीक्षा की। अदालत के सामने प्रस्तुत जानकारी के अनुसार, जब हेल-कंट्रोल सिस्टम एक घंटे से अधिक समय तक चलाया गया, तब भारी बारिश हुई। इसी आधार पर अदालत ने कहा कि याचिका में उठाई गई चिंताएं सही प्रतीत होती हैं।
सरकार से विस्तृत रिपोर्ट की मांग
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से एंटी-हेल गनों के प्रभावों पर एक विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने को कहा है। सरकार को भारत के साथ-साथ मेक्सिको, रोमानिया और अन्य देशों में इस तकनीक के उपयोग और उसके प्रभावों की जानकारी भी अदालत के समक्ष रखनी होगी। अदालत ने यह भी जानना चाहा है कि देवरीघाट और बरेओंघाट के आसपास के क्षेत्रों में एंटी-हेल गनों के बंद होने के बाद क्या कोई सकारात्मक परिवर्तन दिखाई देता है।
नौणी विश्वविद्यालय को नोटिस
इस मामले में डॉ. वाईएस परमार औद्यानिकी एवं वानिकी विश्वविद्यालय, नौणी को भी पक्षकार बनाया गया है। विश्वविद्यालय एंटी-हेल गनों की उपयोगिता और उनके संभावित प्रभावों का अध्ययन कर रहा है। राज्य ने अदालत को बताया कि इस अध्ययन को अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने में चार साल और लग सकते हैं। हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार के माध्यम से नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब मांगा है।
एंटी-हेल गन का कार्य
एंटी-हेल गन का उपयोग मुख्य रूप से सेब के बागों को ओलावृष्टि से बचाने के लिए किया जाता है। यह मशीन तेज आवाज या दबाव वाली तरंगें ऊपर की ओर भेजती है, जिसका उद्देश्य ओलावाले बादलों में ओले बनने की प्रक्रिया को रोकना या कम करना होता है। हिमाचल के सेब उत्पादक क्षेत्रों में बागवान लंबे समय से इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि, इसका वैज्ञानिक लाभ और आसपास के मौसम पर इसके प्रभाव का सवाल अब हाईकोर्ट के समक्ष है।