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2029 के चुनावों में जनरेशन-जेड की चुनौतियाँ और मतदाता अधिकार

2029 के लोकसभा चुनावों में जनरेशन-जेड की स्थिति चिंताजनक है। युवा मतदाता को वोट देने के अधिकार के लिए कई बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है। जानें कैसे तकनीकी खामियों और जटिल प्रक्रियाओं के कारण युवा मतदाता प्रभावित हो सकते हैं। इस लेख में हम चुनाव आयोग की भूमिका और युवा मतदाताओं की चुनौतियों पर चर्चा करेंगे।
 

भारत की युवा पीढ़ी और चुनावी प्रक्रिया


भारत में 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए 35 वर्ष से कम उम्र के युवाओं की स्थिति चिंताजनक है। हर परिवार में ऐसे कई युवा हैं जो वोट देने के अधिकार से वंचित रह सकते हैं। इसके पीछे कारण है कि उन्हें Form-6 के जटिल सवालों का सामना करना पड़ेगा और बार-बार एसडीएम कार्यालयों में जाकर अपनी पहचान साबित करनी होगी। यदि वे ऐसा नहीं कर पाते हैं, तो चुनाव के समय उन्हें घर पर ही रहना पड़ेगा।


हालांकि चुनाव आयोग ने इस उम्र के मतदाताओं की संख्या का कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं दिया है, लेकिन यह सच है कि भारत की जनसंख्या युवा है। 2029 में 18 से 35 वर्ष के बीच की जनसंख्या लगभग 35 से 40 करोड़ हो सकती है। ये युवा न केवल स्मार्टफोन के मालिक हैं, बल्कि सोशल मीडिया पर भी सक्रिय हैं। इसलिए, 2029 के चुनावों में जनरेशन-जेड एक महत्वपूर्ण राजनीतिक वर्ग बनकर उभरेगा।


इस वर्ग की पहली चुनौती यह है कि 2029 में 35 वर्ष का मतदाता 1994 में जन्मा होगा। ऐसे में, 2002 के वोटर कार्ड के आधार पर उसकी पहचान की जाएगी। चुनाव आयोग का SIR पोर्टल नागरिकों को 2002 की अंतिम मतदाता सूची में अपने नाम की खोज करने के लिए कहता है। यह प्रक्रिया बेहद जटिल है और युवा मतदाता को अपने माता-पिता के रिकॉर्ड में नाम खोजने के लिए मजबूर करती है।


यदि किसी का नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं है, तो उसे Form-6 भरकर अपनी पहचान साबित करनी होगी। यह एक ऐसा तंत्र है जो युवा नागरिकों को उनके अधिकारों से वंचित कर सकता है। दिल्ली के अनुभव से यह स्पष्ट होता है कि लगभग 1.45 करोड़ मतदाता ऐसे हैं जिनके नाम ड्राफ्ट रोल में नहीं हैं।


युवाओं की स्थिति और भी जटिल है क्योंकि वे अक्सर अपने घरों से दूर रहते हैं, नौकरी के लिए शहर बदलते हैं और उनकी पहचान के दस्तावेज भी अलग-अलग पते पर होते हैं। यदि 2029 के 35-40 करोड़ युवा मतदाताओं में से केवल 1% भी इस प्रक्रिया में फंस जाते हैं, तो यह संख्या लाखों में पहुंच सकती है।


चुनाव आयोग के भीतर भी इस मुद्दे पर आपत्तियां उठाई गई हैं। दो चुनाव आयुक्तों ने चुनावी रोल डेटाबेस के केंद्रीकरण पर चिंता जताई है। यह सवाल उठता है कि क्या इस प्रणाली में पारदर्शिता है और क्या नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की जा रही है।


गोवा के मामले में, 97 मतदाताओं के नाम अंतिम सूची से गायब हो गए, जबकि स्थानीय अधिकारियों ने उन्हें योग्य माना था। यह दर्शाता है कि तकनीकी प्रणाली में कितनी खामियां हो सकती हैं।


इसलिए, यह आवश्यक है कि चुनाव आयोग युवा मतदाताओं की संख्या और उनकी स्थिति का स्पष्ट आंकड़ा प्रदान करे। इससे यह पता चलेगा कि जनरेशन-जेड के वोटों को कैसे प्रभावित किया जा रहा है।


अंत में, यह सवाल उठता है कि डिजिटल भारत में मतदाता अधिकारों की रक्षा का जिम्मा किसका है? क्या यह राज्य का कर्तव्य नहीं है कि वह सुनिश्चित करे कि कोई भी योग्य नागरिक तकनीकी खामियों के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो?