FCRA बिल विवाद: मोदी सरकार के संशोधन पर उठे सवाल
FCRA बिल का प्रस्ताव
FCRA बिल विवाद: मोदी सरकार ने मानसून सत्र के दौरान फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट, 2010 में संशोधन का प्रस्ताव पेश किया है। इस संशोधन के तहत 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026' के माध्यम से केंद्र सरकार को एक नामित प्राधिकरण स्थापित करने की अनुमति दी जाएगी। यदि किसी संस्था का FCRA रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, वह स्वेच्छा से रजिस्ट्रेशन छोड़ देती है या उसका नवीनीकरण नहीं होता है, तो सरकार इस प्राधिकरण का गठन कर सकेगी। इस प्रस्ताव का विरोध विपक्षी दलों के साथ-साथ अमेरिकी सांसदों ने भी किया है।
अमेरिकी सांसदों की प्रतिक्रिया
भारत में फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) के प्रस्तावित संशोधन पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी के सांसद राइली मूर ने कड़ी आलोचना की है। उन्होंने इसे ईसाई समुदाय पर एक सीधा हमला बताया है। मूर ने चेतावनी दी है कि इससे भारत और अमेरिका के बीच संबंधों में खटास आ सकती है। उन्होंने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, 'भारत में ईसाई समुदाय का इतिहास सेंट थॉमस द एपोस्टल के आगमन से शुरू होता है, लेकिन अब संसद इस बिल के माध्यम से चर्चों और धार्मिक चैरिटीज पर नियंत्रण स्थापित करने की कोशिश कर रही है।' वेस्ट वर्जीनिया से सांसद मूर ने कहा, 'यदि यह बिल पारित होता है, तो यह ईसाइयों पर गंभीर प्रभाव डालेगा और भारत-अमेरिका संबंधों को संकट में डाल सकता है।'
विपक्ष और एनजीओ की चिंताएं
विपक्षी दलों और गैर-सरकारी संगठनों ने फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) एक्ट (FCRA) के संशोधन को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त की हैं। उनका मानना है कि नए संशोधनों के बाद विदेशी फंडिंग पर निर्भर संगठनों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण बढ़ जाएगा। चर्च और अन्य धार्मिक संस्थाएं इस बात को लेकर चिंतित हैं कि यदि उनका रजिस्ट्रेशन पांच साल बाद समाप्त होता है और किसी कारणवश नवीनीकरण नहीं होता है, तो उनके द्वारा संचालित स्कूलों या अस्पतालों पर केंद्र सरकार का सीधा नियंत्रण हो सकता है। वर्तमान नियमों के अनुसार, गैर-सरकारी संगठनों, धार्मिक संस्थानों, शैक्षणिक संस्थानों और चैरिटेबल ट्रस्टों को विदेशी चंदा जुटाने और उसके उपयोग के लिए गृह मंत्रालय में रजिस्ट्रेशन कराना आवश्यक है।