FCRA संशोधन बिल 2026: विदेशी चंदे पर नए नियमों का प्रभाव
अमेरिकी सांसदों की चिंता
अमेरिकी सांसद राइली मूर ने प्रस्तावित FCRA संशोधनों को ईसाई समुदाय पर हमला बताते हुए इसे भारत और अमेरिका के संबंधों के लिए एक गंभीर चिंता का विषय करार दिया है। विपक्ष भी इस कानून का विरोध कर रहा है।
FCRA का परिचय
FCRA, यानी Foreign Contribution (Regulation) Act, 2010, का उद्देश्य विदेश से आने वाले चंदे और आर्थिक योगदान को नियंत्रित करना है। इसका मुख्य लक्ष्य यह सुनिश्चित करना है कि विदेशी धन का उपयोग भारत की संप्रभुता, राष्ट्रीय हित, या सुरक्षा के खिलाफ न हो। इस कानून के तहत NGO, ट्रस्ट, और अन्य संस्थाओं को विदेशी योगदान प्राप्त करने के लिए पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेनी होती है।
इस कानून में 2010 में FCRA पंजीकरण की अवधि पांच वर्ष निर्धारित की गई थी। 2020 में किए गए संशोधनों में विदेशी धन को अन्य संस्थाओं को ट्रांसफर करने पर रोक, प्रशासनिक खर्च की सीमा 20% और SBI की दिल्ली शाखा के माध्यम से विदेशी योगदान लेने की व्यवस्था शामिल की गई थी। 2022 में, सुप्रीम कोर्ट ने इन कड़े प्रावधानों को संवैधानिक रूप से वैध माना।
2026 का FCRA Amendment Bill: क्या बदलाव लाएगा?
इस बिल का सबसे बड़ा बदलाव विदेशी चंदे से निर्मित संपत्तियों के प्रबंधन से संबंधित है।
1. नया 'Designated Authority'
बिल में एक Designated Authority बनाने का प्रस्ताव है। यदि किसी संगठन का FCRA प्रमाणपत्र रद्द हो जाता है या वह स्वयं इसे सरेंडर कर देता है, तो उसके विदेशी योगदान और उससे निर्मित संपत्तियां इस प्राधिकरण के पास अस्थायी रूप से निहित हो सकती हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी NGO ने विदेशी चंदे से अस्पताल बनाया है और बाद में उसका FCRA पंजीकरण समाप्त हो जाता है, तो उस अस्पताल पर Designated Authority का नियंत्रण आ सकता है।
2. संपत्ति का स्थायी हस्तांतरण
यदि संगठन निर्धारित समय में नया FCRA प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं कर पाता, तो विदेशी योगदान से निर्मित संपत्तियां स्थायी रूप से Designated Authority में निहित हो सकती हैं। इसके बाद इन्हें सरकार के किसी विभाग या स्थानीय प्राधिकरण को सौंपा जा सकता है या बेचा जा सकता है। बिक्री से प्राप्त राशि और अप्रयुक्त विदेशी धन को Consolidated Fund of India में जमा करने का प्रावधान है।
3. मिश्रित धन से बनी संपत्तियों पर प्रभाव
यह प्रावधान सबसे विवादास्पद है। यदि कोई संपत्ति आंशिक रूप से विदेशी चंदे और आंशिक रूप से घरेलू स्रोत से बनी है, तो पूरी संपत्ति Designated Authority में निहित हो सकती है। हालांकि, संस्था यह दावा कर सकती है कि घरेलू धन से बनी हिस्सेदारी उसे वापस की जाए।
सरकार के तर्क
सरकार का कहना है कि विदेशी धन सामान्य घरेलू दान की तरह नहीं है। विदेशी स्रोतों से आने वाले धन के जरिए किसी देश की सामाजिक, राजनीतिक या आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित करने की संभावना रहती है। इसी कारण इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा गया है।
सरकार का तर्क है कि मौजूदा FCRA की धारा 15 में विदेशी चंदे से बनी संपत्तियों को प्राधिकरण के पास रखने का सिद्धांत पहले से मौजूद है। नए बिल का उद्देश्य इस 'legal gap' को समाप्त करना है।
बिल के पक्ष में तर्क
1. विदेशी धन की जवाबदेही बढ़ेगी
सरकार का कहना है कि यदि किसी संगठन को विदेशी स्रोतों से धन मिलता है, तो उस धन और उससे बनी संपत्तियों का उपयोग स्पष्ट होना चाहिए।
2. फर्जी संस्थाओं पर नियंत्रण
नया कानून ऐसे संस्थाओं के मामलों में अंतिम समाधान देने का प्रयास करता है जिनका FCRA प्रमाणपत्र समाप्त हो चुका है।
3. राष्ट्रीय सुरक्षा
भारत की सुरक्षा व्यवस्था का तर्क है कि विदेशी फंड का उपयोग केवल घोषित सामाजिक या धार्मिक उद्देश्य के लिए होना चाहिए।
4. सजा में नरमी
बिल मौजूदा कानून में अधिकतम पांच साल की सजा को एक साल तक करने का प्रस्ताव करता है।
बिल के खिलाफ आपत्तियां
1. सरकार को संपत्ति पर अधिक शक्ति
आलोचकों का कहना है कि FCRA लाइसेंस का खत्म होना हमेशा वित्तीय अपराध साबित होने के बराबर नहीं है।
2. न्यायिक सुरक्षा की चिंता
बिल Designated Authority को संपत्ति पर प्रशासनिक नियंत्रण की शक्ति देता है, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
NGOs और सामाजिक क्षेत्र पर प्रभाव
यह बिल विदेशी फंड पर निर्भर NGOs, चैरिटीज, अस्पतालों, स्कूलों, धार्मिक संगठनों और अनुसंधान संस्थानों को प्रभावित कर सकता है।
भारत में 15 जुलाई 2026 तक 14,449 सक्रिय FCRA प्रमाणपत्र, 22,498 रद्द प्रमाणपत्र और 15,212 समाप्त प्रमाणपत्र थे।
सकारात्मक और नकारात्मक प्रभाव
सकारात्मक प्रभाव:
- विदेशी धन का ऑडिट और जवाबदेही मजबूत हो सकती है।
- फर्जी संस्थाओं और धन के दुरुपयोग पर नियंत्रण बढ़ सकता है।
- विदेशी फंड से बनी संपत्तियों का कानूनी रिकॉर्ड स्पष्ट होगा।
- निष्क्रिय संस्थाओं की संपत्तियों का अंतिम समाधान हो सकेगा।
- राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में निगरानी मजबूत होगी।
नकारात्मक प्रभाव:
- गenuine NGOs के लिए compliance cost बढ़ सकती है।
- FCRA renewal खोने का जोखिम पहले से ज्यादा महंगा हो जाएगा।
- विदेशी फंड से बने अस्पताल, स्कूल और कल्याण ढांचे पर अनिश्चितता बढ़ सकती है।
- छोटे NGOs के लिए कानूनी और प्रशासनिक दबाव बढ़ सकता है।
- सरकार और नागरिक समाज के बीच भरोसे का संकट बढ़ने की आशंका है।
धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थाओं पर प्रभाव
यह बिल राजनीतिक रूप से विवादित है। सरकार का कहना है कि यह किसी विशेष धर्म को निशाना नहीं बनाता। नए नियमों में धार्मिक उद्देश्यों को स्पष्ट रूप से सूचीबद्ध किया गया है।
हालांकि, कुछ धार्मिक संगठनों ने चिंता जताई है कि विदेशी फंड पर निर्भर संस्थाओं की कार्यप्रणाली प्रभावित हो सकती है।
बिल की स्थिति
FCRA Amendment Bill, 2026 अभी कानून नहीं बना है। इसे 25 मार्च 2026 को लोकसभा में पेश किया गया था और फिलहाल संसद में लंबित है।