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Gen Z के मतदाता अधिकारों पर संकट, चुनाव आयोग में मतभेद का असर

The ongoing disputes between the Chief Election Commissioner and Election Commissioners are causing significant delays in the inclusion of Gen Z voters in the electoral rolls. This situation has led to serious accusations from the Congress party against the Modi government, claiming that it fears the youth's potential impact on elections. With the Special Summary Revision (SSR) process halted, many eligible 18-year-olds are at risk of being excluded from voting. The report highlights the urgent need for the Election Commission to resolve these issues to ensure that young voters can participate in the upcoming elections. As the political landscape evolves, the implications for democracy and youth engagement are profound.
 

मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद

नई दिल्ली। चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों (ECs) के बीच मतदाता सूची के वार्षिक पुनरीक्षण (SSR) को लेकर मतभेद अब नए मतदाताओं पर प्रभाव डालता नजर आ रहा है। एक रिपोर्ट के अनुसार, 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवा मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने की प्रक्रिया में देरी हो रही है।


कांग्रेस पार्टी ने इस मुद्दे पर मोदी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि सरकार Gen Z से भयभीत है, क्योंकि यह मोदी के खिलाफ खड़ी है। इस घबराहट के चलते मोदी ने ज्ञानेश कुमार के साथ मिलकर एक योजना बनाई है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार अब Gen Z के वोटिंग अधिकार को छीनने में लगे हुए हैं। चुनाव आयोग हर साल विशेष सारांश पुनरीक्षण (SSR) करता है, ताकि नए 18 साल के युवाओं को वोटर लिस्ट में जोड़ा जा सके, लेकिन ज्ञानेश कुमार ने 2024 से SSR पर रोक लगा दी है। इसका मतलब है कि अब 18 साल के नए मतदाता वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो पाएंगे।


हालांकि, दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी SSR को शुरू करने की मांग कर रहे हैं, लेकिन ज्ञानेश कुमार इसे रोकने पर अड़े हुए हैं। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश और गोवा में अगले साल चुनाव होने वाले हैं, लेकिन यहां SSR नहीं किया गया है, जिससे 18 साल के नए मतदाता वोटर लिस्ट में शामिल नहीं हो पाए हैं।


मोदी सरकार Gen Z से डरती है, क्योंकि वो मोदी के खिलाफ खड़ा है।

इसी घबराहट में मोदी ने ज्ञानेश कुमार के साथ मिलकर एक साजिश रची है।

अब ज्ञानेश कुमार Gen Z के वोटिंग अधिकार को छीनने में लगे हुए हैं।

चुनाव आयोग हर साल Special Summary Revision (SSR) करता है, ताकी नए 18 साल के… pic.twitter.com/XXgzk2TVDC

— Congress (@INCIndia) September 24, 2026


बिहार में SIR की प्रक्रिया के बाद एक साल बीत चुका है। इसके बाद से 18 साल के नए मतदाता को जोड़ने का कार्य नहीं हुआ है। यह स्पष्ट है कि ज्ञानेश और मोदी ने देश के लोकतंत्र को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। लेकिन याद रखें कि Gen Z आपके अपराधों को नोट कर रहा है और सबक सिखाएगा। जनरेशन-जी के वोटिंग अधिकार पर संकट, जनवरी 2024 से अटका विशेष मतदाता पुनरीक्षण।


रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2024 में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) की शुरुआत के बाद से वार्षिक विशेष सारांश पुनरीक्षण (SSR) की प्रक्रिया कई राज्यों में आगे नहीं बढ़ सकी है। 2025-26 में भी नियमित SSR नहीं कराया गया, जबकि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने इसे फिर से शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दिया।


मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के बीच मतभेद का प्रभाव


रिपोर्ट में कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों के बीच इस मुद्दे पर मतभेद के कारण SSR की प्रक्रिया प्रभावित हुई है। आयोग को इस संबंध में कानूनी सलाह लेने की आवश्यकता भी पड़ी। इसके बाद दोनों चुनाव आयुक्तों ने नए 18 वर्षीय मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने की आवश्यकता पर जोर दिया।


नए मतदाताओं के लिए चार अवसर


मतदाता सूची में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं को शामिल करने के लिए साल में चार कट-ऑफ तिथियाँ निर्धारित की गई हैं—1 जनवरी, 1 अप्रैल, 1 जुलाई और 1 अक्टूबर। इससे साल के विभिन्न समय में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले युवाओं को मतदाता सूची में शामिल किया जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, 2026-27 के लिए भी बड़ी संख्या में योग्य 18 वर्षीय मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।


50 अधिकारियों के ACR पर भी प्रभाव


रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 2025-26 में स्थानांतरित किए गए लगभग 50 चुनाव अधिकारियों के वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन (ACR) को लेकर प्रशासनिक समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं। इनमें CEO और डिप्टी EC स्तर के अधिकारी शामिल हैं। CEC और दोनों ECs के हस्ताक्षर की आवश्यकता के कारण कुछ ACR लंबित बताए गए हैं।


पूरी प्रक्रिया में देरी का दावा


SSR की सामान्य प्रक्रिया में राज्यों को पहले तैयारियाँ करने के बाद ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित करनी होती है। इसके बाद दावे और आपत्तियाँ आमंत्रित की जाती हैं और अंतिम मतदाता सूची प्रकाशित की जाती है। रिपोर्ट के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया में देरी का असर आगामी चुनावों की तैयारियों पर भी पड़ सकता है।


रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि उत्तराखंड और पंजाब जैसे चुनावी राज्यों में मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया समय पर पूरी करना महत्वपूर्ण है। बिहार में भी मतदाता सूची पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर अलग से उल्लेख किया गया है।