अखिलेश यादव की सॉफ्ट हिंदुत्व राजनीति: मुस्लिम चेहरों से दूरी और नए रणनीतिक कदम
सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति का प्रयोग
गैर भाजपा दलों की सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति अब तक सफल नहीं हो पाई है। कांग्रेस ने 2007 में गुजरात विधानसभा चुनाव में इसे अपनाया था, लेकिन इसके बाद से अन्य दलों ने भी इसे आजमाया, फिर भी सफलता नहीं मिली। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी मंदिरों का दौरा किया, लेकिन इसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं आया। हिंदुत्व की राजनीति में केवल वही दल सफल हुए हैं, जो भाजपा के साथ हैं। इस संदर्भ में, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की हालिया गतिविधियाँ ध्यान आकर्षित कर रही हैं।
अखिलेश यादव सॉफ्ट हिंदुत्व की राजनीति को अपना रहे हैं और मुस्लिम चेहरों से दूरी बना रहे हैं ताकि चुनाव के दौरान भाजपा उन पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप न लगा सके। मुरादाबाद के विधायक कमाल अख्तर का विवाद सांसद रूचि वीरा के साथ चल रहा था, जिसके बाद उन्होंने पार्टी के मुख्य सचेतक पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी जगह दलित नेता को नियुक्त किया जा सकता है।
इससे पहले आजम खां और उनके बेटे अब्दुल्ला आजम ने सपा से दूरी बना ली है। मुस्लिम चेहरों के रूप में सपा के पास इकरा हसन और जिया उर रहमान बर्क जैसे नए चेहरे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि अखिलेश यादव हिंदू नेताओं को आगे लाना चाहते हैं। अगले विधानसभा चुनाव में सपा मुस्लिम उम्मीदवारों की संख्या घटा सकती है। उत्तर प्रदेश में मुसलमानों के लिए सपा सबसे भरोसेमंद पार्टी बनी हुई है।
हाल ही में, अखिलेश यादव ने ज्योतिषपीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती से मुलाकात की और उनका आशीर्वाद लिया। उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर चढ़ावे के मुद्दे को उठाया और न्यायिक जांच की मांग की। राम मंदिर ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय के इस्तीफे के बाद भी अखिलेश ने पूरे ट्रस्ट को भंग करने की मांग की है।
अखिलेश यादव हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को उठाते हुए सैफई में विशाल हनुमान मंदिर का निर्माण करवा रहे हैं। उन्होंने कहा कि मंदिर के निर्माण के बाद वे अयोध्या जाकर रामलला के दर्शन करेंगे। यह देखना होगा कि यह रणनीति कितनी सफल होती है, लेकिन वे सॉफ्ट हिंदुत्व का कार्ड खेल रहे हैं और जाति के विभाजन को बढ़ावा देने का प्रयास कर रहे हैं।