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अनिल विज ने बिजली कर्मचारियों के बीच जाकर विरोध का माहौल बदला

हरियाणा के ऊर्जा मंत्री अनिल विज ने अपने बीमार भाई को अस्पताल में छोड़कर बिजली कर्मचारियों के बीच जाकर विरोध का माहौल बदल दिया। उन्होंने अपनी स्पष्टवादिता और जनसंपर्क कौशल से कर्मचारियों के साथ संवाद किया, जिससे विरोध का स्वरूप बदल गया। विज ने कहा कि वे जनता के आदमी हैं और सभी को भाई मानते हैं। उन्होंने कर्मचारियों को आश्वासन दिया कि उनकी मांगों पर चर्चा की जाएगी। इस घटनाक्रम ने हरियाणा की राजनीति में एक नया मोड़ लाया है, जहां संवाद और विश्वास ने विरोध को समाप्त किया।
 

अनिल विज का साहसिक कदम

*मैं अपने भाई को पीजीआई में भर्ती करवाकर आया हूं, वह भी मेरा भाई है, आप भी मेरे भाई हैं इसलिए मैं आपके बीच आया हूं: अनिल विज


*पीजीआई में भर्ती भाई को छोड़ हजारों आंदोलनकारी बिजली कर्मचारियों के बीच पहुंचे ऊर्जा मंत्री, विरोध के बीच बदल गया पूरा माहौल


चंडीगढ़ (चन्द्र शेखर धरणी): हरियाणा के परिवहन, ऊर्जा एवं श्रम मंत्री अनिल विज ने शुक्रवार को एक बार फिर अपने बेबाक, स्पष्टवादी और जनसंपर्क के अनोखे अंदाज से सबको चौंका दिया। उस समय हजारों बिजली कर्मचारी अपनी विभिन्न मांगों को लेकर उनके आवास का घेराव करने के लिए अंबाला कैंट की ओर बढ़ रहे थे। कर्मचारी सरकार और मंत्री के खिलाफ जोरदार नारेबाजी कर रहे थे।


इसी बीच अनिल विज अपने भाई राजेंद्र विज को हृदय संबंधी परेशानी के चलते पीजीआई में भर्ती कराने गए हुए थे। शुक्रवार सुबह अचानक तबीयत बिगड़ने पर उन्हें अस्पताल में दाखिल कराया गया था। जैसे ही विज को सूचना मिली कि बिजली कर्मचारी उनके आवास की ओर कूच कर रहे हैं और उनके खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, उन्होंने अपने भाई को अस्पताल में छोड़कर तत्काल अंबाला कैंट लौटने का निर्णय लिया।


सुरक्षा अधिकारियों ने उन्हें प्रदर्शनकारियों की भीड़ में जाने से रोकने का प्रयास किया। उनका मानना था कि विरोध का माहौल है और इतनी बड़ी भीड़ के बीच जाना जोखिम भरा हो सकता है। लेकिन विज ने सुरक्षा कर्मियों की एक नहीं सुनी और कहा, “मैं पब्लिक का बंदा हूं, यह मेरी पब्लिक है।” इसके बाद उन्होंने अपनी गाड़ी बीच रास्ते में रुकवाई और पैदल ही हजारों आंदोलनकारी कर्मचारियों के बीच पहुंच गए।


जैसे ही अनिल विज प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंचे, कुछ क्षणों के लिए पूरा माहौल शांत हो गया। विरोध के स्वर थम गए और वहां सन्नाटा छा गया। विज ने कर्मचारियों से कहा—


“अब भी लगाओ मुर्दाबाद के नारे। मैंने सारी जिंदगी ऐसे ही काटी है। मेरे मां-बाप ने मुझे कभी झूठ बोलना नहीं सिखाया। अगर उन्होंने मुझे झूठ बोलना सिखाया होता तो आज मैं बहुत बड़ा लीडर होता।”


इसके बाद उन्होंने भावुक अंदाज में कहा— “मैं अपने भाई को पीजीआई में भर्ती करवाकर आया हूं, क्योंकि वह भी मेरा भाई है। लेकिन आप भी मेरे भाई हैं। इसलिए मैं आपके बीच आया हूं।”


उन्होंने आगे कहा कि, “भाई की हालत देखते हुए मुझे पीजीआई से नहीं आना चाहिए था, लेकिन आप लोग भी किसी उम्मीद से आए हैं। मैं सबकी सुनता हूं। पिछले दिनों भी आपके कुछ साथी मुझसे मिले थे, उनकी बात भी मैंने सुनी थी।”


अनिल विज ने कर्मचारियों को भरोसा दिलाया कि उनके बड़े भाई के स्वास्थ्य में सुधार होने और सर्जरी पूरी होने के बाद, लगभग 15–20 दिनों के भीतर वह स्वयं कर्मचारियों को पत्र भेजकर बातचीत के लिए बुलाएंगे। उन्होंने कहा कि विभाग के सभी वरिष्ठ अधिकारियों को सामने बैठाकर मांगपत्र के प्रत्येक बिंदु पर खुली चर्चा की जाएगी।


उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, “जो भी संभव होगा, वह ढंके की चोट पर करेंगे। रिस्क अलाउंस के विषय में भी मैं अधिकारियों को पहले ही निर्देश दे चुका हूं।”


विज की साफगोई और सहज व्यवहार ने देखते ही देखते पूरे माहौल को बदल दिया। कुछ ही मिनट पहले तक जो कर्मचारी “अनिल विज मुर्दाबाद” के नारे लगा रहे थे, वही “अनिल विज जिंदाबाद” के नारे लगाने लगे। विरोध का वातावरण संवाद और विश्वास में बदल गया।


अनिल विज का यह ‘गब्बर स्टाइल’ देखकर वहां मौजूद लोग भी हैरान रह गए। जिस स्थान पर भारी विरोध, नारेबाजी और तनावपूर्ण माहौल हो, वहां किसी मंत्री का सुरक्षा घेरे की परवाह किए बिना पैदल प्रदर्शनकारियों के बीच पहुंच जाना किसी बड़े जोखिम से कम नहीं था। लेकिन विज ने खतरे की परवाह नहीं की और सीधे कर्मचारियों के बीच जाकर संवाद का रास्ता चुना।


शुक्रवार का यह घटनाक्रम हरियाणा की राजनीति में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहेगा। एक ओर मंत्री अपने बीमार भाई की चिंता में पीजीआई पहुंचे थे, वहीं दूसरी ओर हजारों नाराज कर्मचारियों के बीच जाकर उन्होंने संवाद, स्पष्टवादिता और भरोसे के बल पर विरोध का माहौल बदल दिया। यह दृश्य अनिल विज की उस राजनीतिक कार्यशैली का उदाहरण बन गया, जिसमें वे टकराव से बचने के बजाय सीधे लोगों के बीच जाकर बात करना अधिक उचित मानते हैं।


बेशक इस भीड़ की पटकथा अनिल विज या उनकी सरकार के विरोधियों ने लिखी हो लेकिन अनिल विज तो अनिल विज हैं। जब हजारों की संख्या में कर्मचारी उनके निवास के बाहर बैठने और नारेबाजी करने की सूचना अनिल विज के कानों में पड़ी तो फिर अनिल विज से रहा ना गया। हालांकि वह समय उनके लिए धर्म संकट से भरा था। वह अपने भाई राजेंद्र विज जी की बाईपास सर्जरी के लिए उन्हें पीजीआई भर्ती करवाने के लिए गए हुए थे। लेकिन यह परिस्थितियां भी उन्हें संभालनी थी, सरकार की साख बचाना भी एक प्राथमिकता थी। उन्होंने मौके पर स्वयं जाने के लिए ड्राइवर को बोला तो सिक्योरिटी टीम सकते में आ गई और उन्होंने अनिल विज को रोकने के लाख प्रयास किए। लेकिन अनिल विज ने कहा कि जो नाराज हैं वह भी मेरे भाई हैं। इस भाई को मैं आकर संभाल लूंगा, इतनी चिलचिलाती धूप में खड़े अपने भाइयों को पहले संभाल लूं। सिक्योरिटी के लाख मना करने के बाद भी अनिल विज नहीं माने और नाराज कर्मचारियों के बीच स्वयं पहुंच गए। जहां अनिल विज मुर्दाबाद के नारे लग रहे थे।


विज ने कहा कि मैं जनता का आदमी हूं, कोठियों वाला आदमी नहीं हूं जो कोठी से नीचे नहीं उतरूंगा। मुझे झूठ ना मेरी मां ने बोलना सिखाया ना मेरे पिता ने। मैंने पूरा जीवन ऐसे ही काटा है और अगर मुझे झूठ बोलना आता तो आज मैं एक बहुत बड़ा नेता होता। उनकी यह बातें सुनकर सभी कर्मचारियों के नाराज चेहरे खुशी से चमक उठे। उस बात पर अनिल विज ने सभी कर्मचारियों से एक विनती की की जो अनिल विज मुर्दाबाद के नारे पहले लगा रहे थे एक बार और लगा दो मजा आ जाएगा तो इतने में अनिल विज जिंदाबाद के नारों से पूरा क्षेत्र गूंज उठा और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा माहौल बेहद खुशनुमा नजर आने लगा। अनिल विज ने आज फिर से यह साबित किया कि नेतृत्व करने की कला खुद भगवान देकर भेजते हैं।


अनिल विज ने मौके पर एक कुशल और दूरदर्शी सूझबूझ का उदाहरण पेश करते हुए अपनी घरेलू समस्या भी बताई और और उनके समाधान का रास्ता भी बनाया। जिस कारण से सभी कर्मचारी खुशी-खुशी अपने घर लौटे। अगर यही कर्मचारी नाराज और मायूस होकर लौटते तो यह नाराजगी शायद सरकार के खिलाफ एक धरने प्रदर्शन या आंदोलन का रूप भी ले सकती थी। जिससे प्रदेश का सरकारी कामकाज भी प्रभावित होता और सरकार के खिलाफ कर्मचारियों का माहौल बनना भी उचित नहीं था। अनिल विज ने यह साबित किया कि मसला कितना भी बड़ा हो अच्छी और सकारात्मक सोच के साथ उसे समाप्त किया जा सकता है।