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अमित शाह की राजनीति: सत्ता का अहंकार और जंतर-मंतर की यादें

इस लेख में अमित शाह की राजनीतिक यात्रा और जंतर-मंतर की घटनाओं का विश्लेषण किया गया है। 2011-12 के अन्ना आंदोलन से लेकर 2026 में उनके अहंकार और सत्ता के प्रति दृष्टिकोण पर चर्चा की गई है। जानें कैसे उन्होंने भाजपा में दबंगई को स्थापित किया और विपक्ष को कमजोर करने की रणनीतियाँ अपनाई। क्या यह उनके लिए दीर्घकालिक सफलता का मार्ग प्रशस्त करेगा? पढ़ें पूरी कहानी।
 

अमित शाह का जंतर-मंतर का अनुभव

साल 2011-12 में अन्ना आंदोलन के दौरान, अमित शाह ने एक शाम जंतर-मंतर पर जाकर वहां की भीड़ का मंजर देखा। उन्होंने उस समय नरेंद्र मोदी को फोन कर कहा कि दिल्ली आने की तैयारी करें। अब जुलाई 2026 में, क्या शाह ने उस जंतर-मंतर पर बच्चों के बारे में सोचा जो सोनम वांगचुक के लिए आए थे? मेरा मानना है कि नहीं। इसका कारण यह है कि सत्ता के अहंकार ने उन्हें इस कदर प्रभावित किया है कि वे वास्तविकता से दूर हो गए हैं।


अमित शाह का पसीना और अहंकार

2015 में, भाजपा के पुराने मुख्यालय पर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद, अमित शाह का चेहरा पसीने से तर था। उन्होंने पसीना पोंछते हुए कहा कि फोटोग्राफरों द्वारा खींची गई तस्वीरें कभी नहीं छपेंगी। यह उनके आत्मविश्वास और अहंकार का प्रतीक था।


हाल ही में 29 जुलाई 2026 को राहुल गांधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस में, अमित शाह का चेहरा टीवी पर दिखा। यह चेहरा देखकर लोगों को जुगुप्सा हुई होगी, जैसे कोई बर्बर आक्रमणकारी। यह अहंकार ने उन्हें सर्वज्ञ और सर्वशक्तिमान बना दिया है।


भय और दबंगई की राजनीति

अमित शाह ने भाजपा और संघ में दबंगई को सत्ता का राजधर्म बना दिया है। उन्होंने कहा है कि बिना भय के अनुशासन और सत्ता स्थायी नहीं हो सकती। इस प्रकार, उन्होंने मुस्लिम समुदाय को डराने और विपक्ष को कमजोर करने की रणनीति अपनाई है।


उन्होंने अन्ना हजारे के जंतर-मंतर में लोगों के मूड को समझा, लेकिन केवल पुलिस के तरीकों पर ध्यान दिया। न तो उन्होंने कैबिनेट में सलाह ली, न ही भाजपा के नेताओं से।


संसद में घटनाक्रम

अमित शाह ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद संसद में भाजपाई सांसदों के बीच प्रधान को शाबाशी दी। लेकिन उन्होंने खुद कॉकरोच नेताओं और सोनम वांगचुक से बात नहीं की। यह स्थिति किसी पूर्व प्रधानमंत्री या गृह मंत्री के लिए असामान्य थी।


संसद मार्ग पर 1966 में साधु-संतों का कूच हुआ था, जिसमें गृह मंत्री गुलजारी लाल नंदा ने नैतिक जिम्मेदारी ली। यह तुलना आज के नेताओं के साथ की जा सकती है, जो अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं।