अमेरिका-चीन तनाव: ताइवान के साथ व्यापार समझौता और वैश्विक प्रभाव
अमेरिका और चीन के बीच बढ़ता तनाव
अमेरिका और चीन के बीच की प्रतिकूलता अब 'शीत युद्ध 2.0' के रूप में विकसित हो चुकी है। यह विवाद अब केवल व्यापारिक मुद्दों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह तकनीकी, जासूसी और सैन्य शक्ति के वर्चस्व की लड़ाई में बदल गया है। हाल ही में, अमेरिका और ताइवान ने एक महत्वपूर्ण व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जो वैश्विक व्यापारिक परिदृश्य में महत्वपूर्ण बदलाव ला सकता है।
व्यापार समझौता और निवेश
अमेरिका और ताइवान के बीच हुए इस समझौते के तहत ताइवान की वस्तुओं पर शुल्क में कमी की जाएगी, और इसके बदले ताइवान अमेरिका में 250 अरब डॉलर का नया निवेश करेगा। यह समझौता राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 'व्यापार असंतुलन दूर करने' की नीति के तहत किया गया है। इससे पहले, ट्रंप ने यूरोपीय संघ और जापान के साथ भी ऐसे समझौते किए थे।
चीन की प्रतिक्रिया
चीन ने इस समझौते को ताइवान का 'आर्थिक शोषण' करार दिया है। अमेरिकी वाणिज्य मंत्रालय ने इसे एक 'आर्थिक साझेदारी' के रूप में प्रस्तुत किया है, जिसके तहत अमेरिका में कई 'विश्व स्तरीय' औद्योगिक पार्क स्थापित किए जाएंगे।
भू-राजनीतिक तनाव
चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और इसके साथ बलपूर्वक विलय की धमकी देता रहता है। अमेरिका ने ताइवान को 250 अरब डॉलर के निवेश और सैन्य सुरक्षा का आश्वासन दिया है, जिससे चीन की नाराजगी बढ़ी है।
तकनीकी युद्ध
आधुनिक युग में, जो चिप्स (Semiconductors) पर नियंत्रण रखेगा, वही वैश्विक शक्ति बनेगा। अमेरिका ने चीन को उन्नत एआई चिप्स और उपकरणों की बिक्री पर कड़े प्रतिबंध लगाए हैं।
जासूसी और साइबर हमले
हाल के वर्षों में जासूसी गुब्बारों और साइबर हमलों की घटनाओं ने दोनों देशों के बीच विश्वास को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। अमेरिका का आरोप है कि चीन उसकी महत्वपूर्ण बुनियादी संरचनाओं पर साइबर हमलों की योजना बना रहा है।