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अयातुल्ला खामेनेई: भारत में हीरो या विलेन?

अयातुल्ला खामेनेई, जो तीन दशकों तक ईरान के सर्वोच्च नेता रहे, अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। उनकी मौत के बाद, भारत में उनकी छवि पर बहस छिड़ गई है। क्या वे एक नायक थे या खलनायक? इस लेख में हम उनके प्रभाव, भारत के साथ संबंधों और भारतीयों की राय पर चर्चा करेंगे। जानें कैसे खामेनेई ने ईरान की राजनीति को आकार दिया और भारत में उनकी छवि को कैसे देखा जाता है।
 

अयातुल्ला खामेनेई का प्रभाव

क्या अयातुल्ला अली खामेनेई भारत में एक नायक थे या खलनायक? अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमले के बाद ईरान के सुप्रीम लीडर का निधन हो गया है, और यह सवाल सुनने में सरल लगता है, लेकिन इसका उत्तर जटिल है। खामेनेई ने तीन दशकों से अधिक समय तक ईरान की सर्वोच्चता को संभाला, और उनके शासन के बारे में वैश्विक स्तर पर मतभेद रहे। भारत में भी उनके प्रति राय विभाजित है। कुछ ने उन्हें कट्टरपंथी और लोकतंत्र विरोधी माना, जबकि अन्य ने उन्हें एक मजबूत धार्मिक और वैश्विक शक्ति के प्रतीक के रूप में देखा। हालांकि, भारत सरकार का दृष्टिकोण भावनाओं से अधिक रणनीतिक रहा। ऊर्जा सुरक्षा, चाबहार पोर्ट परियोजना और क्षेत्रीय संतुलन जैसे मुद्दों पर भारत ने ईरान के साथ व्यावहारिक संबंध बनाए रखे। वहीं, कश्मीर जैसे मुद्दों पर खामेनेई के बयानों का भारत ने कूटनीतिक स्तर पर विरोध किया।


इस्लामी गणराज्य ईरान की स्थापना

अयातुल्ला अली खामेनेई, जो तीन दशकों से ईरान की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे, अब इतिहास का हिस्सा बन चुके हैं। अमेरिकी और इजराइली हवाई हमलों में उनकी मौत ने न केवल पश्चिम एशिया की राजनीति में हलचल मचाई है, बल्कि उनके विवादास्पद शासन पर नई बहस भी शुरू कर दी है। खामेनेई, जो ईरान के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले नेताओं में से एक थे, ईरानी समाज में अपने पूर्ववर्ती अयातुल्ला रूहोल्ला खोमैनी के समान प्रभावशाली रहे हैं। हालांकि खोमैनी ने 1979 में इस्लामी गणराज्य की स्थापना की, लेकिन कई लोग मानते हैं कि खामेनेई ने आधुनिक ईरान में सबसे शक्तिशाली नेता के रूप में अपनी पहचान बनाई।


खामेनेई की शिक्षा और विचारधारा

खामेनेई का जन्म 1939 में ईरान के मरशद में हुआ। उन्होंने अपने बचपन में नजफ और क़ुम के इस्लामी मदरसों में शिक्षा ली, जहां उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच का विकास हुआ। 13 वर्ष की आयु में उन्होंने क्रांतिकारी इस्लाम के विचारों को अपनाना शुरू किया, जिसमें नवाब सफावी की शिक्षाएं शामिल थीं। 1958 में उनकी मुलाकात अयातुल्ला खोमैनी से हुई, और उन्होंने उनकी विचारधारा को स्वीकार कर लिया, जिसे 'खोमैनीवाद' कहा जाता है।


खोमैनी का निर्वासन और खामेनेई की भूमिका

खामेनेई ने खोमैनी के निर्देश पर 1962 से शाह मोहम्मद रज़ा पहलवी के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों में भाग लिया। खोमैनी को 1964 में निर्वासित किया गया। 1971 में शाह की गुप्त पुलिस ने खामेनेई को गिरफ्तार कर यातनाएं दीं। 1979 में इस्लामी क्रांति के बाद, खोमैनी ने ईरान के सर्वोच्च नेता के रूप में वापसी की, जबकि खामेनेई को क्रांतिकारी परिषद का सदस्य बनाया गया।


खामेनेई का शासन और भारत के साथ संबंध

खामेनेई के शासन में भारत और ईरान के संबंध कई क्षेत्रों में मजबूत हुए। अमेरिका के प्रतिबंधों से पहले, दोनों देशों के बीच तेल का व्यापार अच्छा था। ईरान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण तेल स्रोत रहा है। भारत ने चाबहार पोर्ट परियोजना में भी निवेश किया, जो दोनों देशों के लिए महत्वपूर्ण है। हालांकि, खामेनेई ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ कई बार कड़े बयान दिए, जिसे भारत ने कूटनीतिक स्तर पर विरोध किया।


खामेनेई के प्रति भारतीयों की राय

अयातुल्ला खामेनेई के प्रति भारतीयों की राय विभाजित है। प्रगतिशील तबका मानता है कि ईरान की बिगड़ती अर्थव्यवस्था और कट्टरपंथ के लिए खामेनेई जिम्मेदार थे। वहीं, एक अन्य तबका उन्हें धार्मिक नेता मानता है और उनकी नीतियों का समर्थन करता है।