आचार्य बालकृष्ण को मिली बड़ी राहत, फर्जी दस्तावेज मामले में बरी
आचार्य बालकृष्ण को मिली राहत
नई दिल्ली: पतंजलि योगपीठ के महामंत्री आचार्य बालकृष्ण को 15 साल पुराने फर्जी दस्तावेज और पासपोर्ट मामले में महत्वपूर्ण राहत मिली है। देहरादून की विशेष CBI अदालत ने सोमवार को उन्हें सभी आरोपों से मुक्त कर दिया। यह मामला भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए कथित तौर पर फर्जी शैक्षणिक प्रमाणपत्रों के उपयोग से संबंधित था। CBI ने आरोप लगाया था कि बरेली के पासपोर्ट कार्यालय में पासपोर्ट बनवाने के दौरान खुर्जा के एक संस्कृत महाविद्यालय से जुड़े फर्जी दस्तावेज पेश किए गए थे।
यह मामला 2011 से शुरू हुआ था, जब CBI ने आचार्य बालकृष्ण के खिलाफ फर्जी दस्तावेजों के आरोपों की जांच आरंभ की। जांच के दौरान, CBI की टीम वाराणसी गई, जहां संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से उनकी शैक्षणिक डिग्रियों की जानकारी ली गई। विश्वविद्यालय ने बताया कि बालकृष्ण की हाईस्कूल और स्नातक की डिग्री सही नहीं थी। इसके बाद CBI ने जून 2011 में प्रारंभिक जांच की और जुलाई में एफआईआर दर्ज की।
इस मामले में आपराधिक साजिश, धोखाधड़ी, फर्जी दस्तावेज तैयार करने और उन्हें असली बताकर इस्तेमाल करने के आरोप लगाए गए थे, साथ ही पासपोर्ट एक्ट की धाराएं भी जोड़ी गई थीं।
जांच में मिले फर्जी रोल नंबर
डिग्री में अलग-अलग नाम के रोल नंबर मिले
जांच के दौरान CBI खुर्जा के राधाकृष्ण संस्कृत महाविद्यालय भी गई। एजेंसी के अनुसार, बालकृष्ण की डिग्री में दर्ज हाईस्कूल रोल नंबर 6118 कमला सिंह पुत्र नरोत्तम सिंह के नाम पर था। वहीं दूसरा रोल नंबर 101706 लीला प्रसाद भट्टाराई पुत्र टेक प्रसाद भट्टाराई के नाम पर था। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर CBI ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया था। एजेंसी का आरोप था कि इन प्रमाणपत्रों का उपयोग भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए किया गया था।
वकील ने दी मामले की जानकारी
वकील ने बताई मामले की पूरी पृष्ठभूमि
आचार्य बालकृष्ण के वकील प्रवीण सेठ ने बताया कि मामला 2011 में दर्ज हुआ था। उनके अनुसार, CBI ने आरोप लगाया था कि बालकृष्ण नेपाली नागरिक हैं और भारतीय पासपोर्ट प्राप्त करने के लिए फर्जी दस्तावेजों का उपयोग किया गया। इस मामले में लंबी जांच और कानूनी प्रक्रिया चली। अंततः सोमवार को देहरादून की विशेष CBI अदालत ने अपना फैसला सुनाते हुए आचार्य बालकृष्ण को सभी आरोपों से बरी कर दिया। अदालत के इस निर्णय से लगभग डेढ़ दशक पुराने मामले का पटाक्षेप हो गया है।