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इजराइल का 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन': बनेई मेनाशे समुदाय की वापसी

इजराइल ने 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन' के तहत बनेई मेनाशे समुदाय के सदस्यों को मणिपुर से वापस लाने का अभियान शुरू किया है। यह समुदाय खुद को प्राचीन इजराइली कबीले का वंशज मानता है। मणिपुर में जातीय हिंसा के कारण उनकी सुरक्षा खतरे में है, और इजराइल में उनकी वापसी एक रणनीतिक निर्णय है। इस लेख में इस समुदाय के इतिहास, वर्तमान चुनौतियों और इजराइल में बसने की कठिनाइयों पर चर्चा की गई है।
 

नई दिल्ली: इजराइल का बड़ा मिशन


नई दिल्ली: ईरान से हजारों किलोमीटर दूर, इजराइल भारत के पूर्वोत्तर में 'ऑपरेशन विंग्स ऑफ डॉन' नामक एक महत्वपूर्ण रणनीतिक अभियान चला रहा है। यह मिशन मणिपुर की कठिन पहाड़ियों से शुरू होकर तेल अवीव की सड़कों तक फैला हुआ है। इस योजना का पहला चरण पिछले सप्ताह 250 बनेई मेनाशे सदस्यों के इजराइल पहुंचने के साथ शुरू हुआ। यह समुदाय खुद को प्राचीन 'मनस्से' कबीले का वंशज मानता है और इस संघर्षरत क्षेत्र को अपनी मंजिल मानता है।


बनेई मेनाशे का इतिहास

कौन हैं बनेई मेनाशे और क्या है इनका इतिहास?


बनेई मेनाशे समुदाय मुख्य रूप से मणिपुर और मिजोरम की कुकी, चिन और मिजो जनजातियों का हिस्सा है। उनका मानना है कि वे 2,700 साल पहले निर्वासित हुए इजराइल के 'मनस्से' कबीले के सीधे वंशज हैं। शोधकर्ता आसफ रेंथलेई के अनुसार, हिब्रू में 'बनेई' का अर्थ 'बच्चे' और 'मेनाशे' का अर्थ 'पोता' होता है। ये लोग सदियों से यहूदी परंपराओं का पालन कर रहे हैं और अब अपनी जड़ों की ओर लौटने के लिए उत्सुक हैं।


मणिपुर में जातीय हिंसा

मणिपुर की जातीय हिंसा और पलायन की मजबूरी


मणिपुर में हुई भीषण जातीय हिंसा ने इस अल्पसंख्यक समुदाय के जीवन को संकट में डाल दिया है। दंगों के दौरान उनके प्रार्थना स्थल नष्ट कर दिए गए और लगभग 20 प्रतिशत आबादी विस्थापित हो गई है। भारत में मजदूरी कर ये लोग सालाना केवल 1,200 डॉलर कमाते हैं, जबकि इजराइल के निर्माण क्षेत्र में उनकी आय 55,000 डॉलर तक हो सकती है। डेनियल हैंगशिंग का कहना है कि भारत उनकी जन्मभूमि है, लेकिन इजराइल ही उनका एकमात्र वादा किया गया पवित्र देश है।


इजराइल की आर्थिक जरूरतें

इजराइल की आर्थिक जरूरत और रणनीतिक उद्देश्य


इजराइल वर्तमान में युद्ध के कारण श्रमिकों की गंभीर कमी का सामना कर रहा है। थाईलैंड और नेपाल के प्रवासी श्रमिकों के लौटने से वहां की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ गया है। इमिग्रेशन मंत्री ओफिर सोफर के अनुसार, बनेई मेनाशे का आगमन इस कमी को पूरा करने में सहायक होगा। सरकार की योजना है कि 2030 तक सभी सदस्यों को वापस लाया जाए। प्रधानमंत्री नेतन्याहू इसे एक रणनीतिक निर्णय मानते हैं, जो इजराइल की सुरक्षा और जनसंख्या संतुलन को बनाए रखेगा।


नस्लवाद और तकनीकी बदलाव

नस्लवाद और तकनीकी बदलाव की कठिन राह


इजराइल में बसना चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इस समुदाय को अक्सर नस्लीय भेदभाव का सामना करना पड़ता है। उनके एशियाई चेहरे के कारण उन्हें 'चाइनीज' या 'कोरोना' कहकर अपमानित किया जाता है। इसके अलावा, भारत के पिछड़े इलाकों से निकलकर इजराइल के हाई-टेक माहौल में खुद को ढालना कठिन है। नागरिकता के लिए उन्हें औपचारिक धर्म परिवर्तन भी करना होगा। फिर भी, लोग उत्साहित हैं और हिब्रू सीखने के लिए डुओलिंगो ऐप का उपयोग कर रहे हैं।