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इज़राइल में चुनाव परिणामों के बाद राजनीतिक संकट गहरा

इज़राइल के हालिया चुनावों ने एक बार फिर से राजनीतिक अनिश्चितता को जन्म दिया है। कोई भी पार्टी स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने में असफल रही है, जिससे बेंजामिन नेतन्याहू की राजनीतिक स्थिति संकट में आ गई है। अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने ऐतिहासिक बढ़त हासिल की है और अब वे 'किंगमेकर' की भूमिका में हैं। जानें इस चुनावी परिदृश्य के पीछे की जटिलताएं और नेतन्याहू के भविष्य पर क्या असर पड़ सकता है।
 

इज़राइल के चुनावों में अनिश्चितता का दौर

इज़राइल के राजनीतिक परिदृश्य में एक बार फिर से अनिश्चितता और गतिरोध का माहौल बन गया है। हाल ही में हुए आम चुनावों की मतगणना के दौरान कोई भी पार्टी या गठबंधन स्पष्ट बहुमत प्राप्त करने में सफल नहीं हो पाया है। इस त्रिशंकु जनादेश के चलते इज़राइल के सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री रहे बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य पर संकट के बादल छा गए हैं। दूसरी ओर, अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों ने ऐतिहासिक बढ़त हासिल की है और अब वे 'किंगमेकर' की भूमिका में आ गई हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि क्या नेतन्याहू के विरोधी इन पार्टियों के साथ सहयोग करने को तैयार होंगे। इज़राइल में फ़िलिस्तीनियों से जुड़े मुद्दे बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।


नेतन्याहू को बड़ा झटका

नेतन्याहू, जो लंबे समय तक प्रधानमंत्री बने रहने की उम्मीद कर रहे थे, को एक बड़ा झटका लगा है। 2022 के चुनावों की तुलना में उनकी 'लिकुड' पार्टी को कम समर्थन मिला है। मतदान के बाद, उन्होंने अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ गठबंधन की संभावना को खारिज कर दिया और इसे 'देशद्रोह' करार दिया। बुधवार को उन्होंने एक 'खतरनाक सरकार' के गठन की चेतावनी दी, जिसमें अरब-नेतृत्व वाली पार्टियां शामिल हो सकती हैं।


मुख्य प्रतिद्वंद्वी का रुख

नेतन्याहू के मुख्य प्रतिद्वंद्वी, पूर्व सैन्य प्रमुख गादी आइसेनकोट ने कुछ शर्तों के साथ अरब-नेतृत्व वाली पार्टियों के साथ सहयोग की संभावना को खुला रखा है। इनमें इज़राइल को एक 'यहूदी राज्य' के रूप में मान्यता देना और हमास को 'चरमपंथी समूह' के रूप में स्वीकार करना शामिल है।


चुनाव परिणामों का विश्लेषण

यह अभी स्पष्ट नहीं है कि विपक्ष के अन्य नेता, जिन्होंने पहले ऐसे गठबंधन को ठुकराया था, क्या नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए अपने रुख पर पुनर्विचार करेंगे। केंद्रीय चुनाव समिति ने बताया कि 89.8 प्रतिशत मतों की गिनती हो चुकी है। इसके अनुसार, 120 सदस्यों वाली संसद में नेतन्याहू के गुट को 53 सीटें मिलने का अनुमान है। आइसेनकोट के नेतृत्व वाले विपक्षी गुट को 48 सीटें मिलने की उम्मीद है। इस तरह, बहुमत की सरकार बनाने के लिए आवश्यक 61 सीटों के आंकड़े से दोनों पक्ष पीछे रह गए हैं।


अरब-नेतृत्व वाले दलों की भूमिका

इस बीच, अरबों की दो पार्टियों को कुल 19 सीटें मिलने का अनुमान है, जो उन्हें एक निर्णायक 'किंगमेकर' की स्थिति में ला सकता है। मंगलवार को हुए चुनावों में अरब मतदाताओं ने रिकॉर्ड संख्या में मतदान किया, ताकि नेतन्याहू और उनके कट्टर दक्षिणपंथी सहयोगियों को सत्ता से हटाया जा सके।


नेतन्याहू की स्थिति

केंद्रीय चुनाव समिति के कंट्रोल मैनेजर एलाड नावेह के अनुसार, सैन्य कर्मियों और राजनयिकों के वोटों सहित अनुपस्थित मतदाताओं की गिनती गुरुवार शाम तक चलने की उम्मीद थी। इजरायली कानून के तहत, आधिकारिक परिणामों को 4 नवंबर तक प्रमाणित किया जाना आवश्यक है। मतदान प्रतिशत लगभग 78 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो 1999 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है।


भविष्य की संभावनाएं

अगर कोई भी पार्टी नेता बहुमत वाला गठबंधन नहीं बना पाता है, तो इजरायल में अगले साल की शुरुआत में फिर से चुनाव हो सकते हैं। आइसेनकोट ने कहा कि इतनी भारी मतदान संख्या वाले चुनाव के बाद, एक और चुनाव कराना गलती होगी।


अरब-नेतृत्व वाले दलों का प्रभाव

अरब-नेतृत्व वाले दलों के मजबूत प्रदर्शन ने इजरायल की राष्ट्रीय पहचान और उसके अरब नागरिकों की राजनीतिक भागीदारी पर बहस को फिर से हवा दे दी है।