इराक में अमेरिकी सैन्य उपस्थिति का अंत: भविष्य की चुनौतियाँ
अमेरिकी सैनिकों की वापसी का ऐतिहासिक क्षण
इराक में अमेरिका की दो दशकों से अधिक की सैन्य उपस्थिति का आज समापन हो गया है। 2003 में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने के लिए इराक में दाखिल हुई अमेरिकी सेना ने 2011 में एक बार वापसी की थी, लेकिन इस्लामिक स्टेट के उभार के कारण 2014 में फिर से लौट आई। अब, 30 सितंबर 2026 को अंतिम अमेरिकी सैनिकों की विदाई के साथ, इराक में अमेरिकी सैन्य अभियान का अध्याय औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिकी सेना के जाने के बाद इराक में शक्ति संतुलन किस दिशा में झुकेगा।
संप्रभुता और सुरक्षा के बीच का संतुलन
अमेरिका की वापसी पहली नजर में इराक की संप्रभुता की वापसी का संकेत देती है। बगदाद अब यह दावा कर सकता है कि उसके क्षेत्र में किसी विदेशी शक्ति की नियमित सैन्य उपस्थिति नहीं है। हालांकि, पश्चिम एशिया की राजनीति में सैनिकों की वापसी केवल संप्रभुता का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह शक्ति के खाली स्थान का भी सवाल है। अमेरिकी सेना ने इराकी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देने के साथ-साथ खुफिया जानकारी, निगरानी, टोही और हवाई क्षमताओं में भी महत्वपूर्ण सहायता प्रदान की है। अब यह जिम्मेदारी इराकी सुरक्षा तंत्र के कंधों पर आ गई है।
तालिबान की तुलना में इराक की स्थिति
इसी संदर्भ में इराक की तुलना अफगानिस्तान से की जा सकती है। 2021 में जब अमेरिकी सेना अफगानिस्तान से निकली, तब तालिबान ने तेजी से सत्ता पर कब्जा कर लिया। लेकिन इराक में ऐसी स्थिति नहीं है, क्योंकि वहां तालिबान जैसा कोई एक संगठन नहीं है जो पूरे देश पर नियंत्रण कर सके। इराक की सेना, पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत है, और इस्लामिक स्टेट ने 2017 में अपना क्षेत्रीय नियंत्रण खो दिया था। इस प्रकार, अमेरिकी सैनिकों की वापसी के बाद सबसे बड़ा खतरा किसी एक संगठन के हाथों सत्ता जाने का नहीं, बल्कि ईरान समर्थित मिलिशियाओं के बढ़ते प्रभाव और आतंकवादी संगठनों के पुनः उभार का है।
ईरान का बढ़ता प्रभाव
ईरान के संदर्भ में सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2003 के बाद से उसने इराक में राजनीतिक दलों, धार्मिक नेटवर्कों और सशस्त्र गुटों के माध्यम से गहरी पैठ बनाई है। कई शक्तिशाली गुटों के ईरान से करीबी संबंध हैं। इराक की नई सरकार ने इन सशस्त्र समूहों को राज्य के नियंत्रण में लाने का प्रयास किया है, लेकिन कई प्रभावशाली गुट हथियार छोड़ने को तैयार नहीं हैं। निरस्त्रीकरण की समयसीमा भी बढ़ाकर जून 2027 कर दी गई है।
भविष्य की चुनौतियाँ
हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि अमेरिकी सेना के जाने के बाद इराक ईरान का उपनिवेश बन जाएगा। इराक की राजनीति अधिक जटिल है। बगदाद अमेरिका के साथ आर्थिक और कूटनीतिक संबंध बनाए रखना चाहता है, साथ ही ईरान के साथ भी ऐतिहासिक और सामाजिक संबंध बनाए रखना चाहता है। लेकिन अमेरिकी सैन्य उपस्थिति के हटने से तेहरान से जुड़े गुटों के लिए राजनीतिक और सुरक्षा क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर बढ़ सकता है।
क्षेत्रीय और वैश्विक प्रभाव
यदि ईरान समर्थित गुटों का प्रभाव बढ़ता है, तो इसका असर इराक की सीमाओं से बाहर भी जाएगा। सऊदी अरब और अन्य खाड़ी देश पहले से ही इराक से निकलने वाले संभावित सुरक्षा खतरों को लेकर चिंतित हैं। 2026 में इराक से जुड़े ईरान समर्थित गुटों पर पड़ोसी देशों के खिलाफ हमलों के आरोप लगे हैं। इससे खाड़ी क्षेत्र में सुरक्षा तनाव बढ़ सकता है।
अमेरिकी घरेलू राजनीति का प्रभाव
अमेरिका की घरेलू राजनीति में भी यह स्थिति दिलचस्प है। 2021 में जब जो बाइडन ने अफगानिस्तान से अमेरिकी सेना हटाई थी, तब डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी आलोचना की थी। आज, इराक से अंतिम अमेरिकी सैनिकों की वापसी ट्रंप प्रशासन के कार्यकाल में हो रही है, लेकिन इसका मूल समझौता बाइडन प्रशासन ने किया था। यह राजनीतिक बहस को जन्म दे सकता है कि क्या अमेरिका को पश्चिम एशिया में स्थायी सैन्य उपस्थिति रखनी चाहिए।
निष्कर्ष
कुल मिलाकर, इराक में असली लड़ाई अब इराकी राज्य और शक्तिशाली सशस्त्र गुटों के बीच होगी। यदि बगदाद इन गुटों को नियंत्रण में लाने में सफल होता है, तो अमेरिकी वापसी इराकी संप्रभुता की नई शुरुआत बन सकती है। लेकिन यदि हथियारबंद गुट राजनीति और सुरक्षा संस्थाओं पर हावी होते हैं, तो अमेरिका की खाली हुई जगह में ईरान का प्रभाव बढ़ सकता है।